डेली24 भारत डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों से जुड़े एक बड़े मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को बड़ा झटका देते हुए उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी है. वहीं, अदालत ने अन्य पांच आरोपियों गुलफिशा फ़ातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत देने की अनुमति दी है. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा की उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ ऐसे प्रथम दृष्टया साक्ष्य मौजूद हैं, जो गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की वैधानिक कसौटी पर खरे उतरते हैं.
अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक हिरासत में रहना अपने आप में जमानत का आधार नहीं बन सकता. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देरी को ‘ट्रंप कार्ड’ की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, खासकर ऐसे मामलों में जो यूएपीए जैसे सख्त कानून के तहत दर्ज हैं. अदालत ने यह भी जोर दिया कि हर आरोपी की भूमिका अलग होती है और सभी आरोपियों को एक ही तराजू में तौलना न्यायसंगत नहीं होगा. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कुछ आरोपियों की ‘केंद्रीय भूमिका’ होती है, जबकि कुछ केवल सहायक या मददगार के रूप में शामिल होते हैं. अदालत ने माना कि उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका बाकियों की तुलना में अलग और गंभीर है. इसके आधार पर कोर्ट ने इस चरण पर उन्हें जमानत पर रिहा करना उचित नहीं माना.
अदालत ने यूएपीए की धारा 43डी(5) का हवाला देते हुए कहा कि यह प्रावधान जमानत के सामान्य नियमों से अलग है. हालांकि यह न्यायिक जांच को पूरी तरह समाप्त नहीं करता, अदालत को यह देखना होता है कि क्या अभियोजन पक्ष द्वारा पेश साक्ष्यों से प्रथम दृष्टया अपराध बनता है या नहीं. कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि ‘आतंकी कृत्य’ केवल प्रत्यक्ष हिंसा या जान-माल के नुकसान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आवश्यक सेवाओं में व्यवधान डालना और अर्थव्यवस्था के लिए खतरा पैदा करना भी इसके दायरे में आता है.
दिल्ली: उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से सुप्रीम कोर्ट का इंकार। दिल्ली दंगा केस में UAPA के तहत मामला जारी। 7 में से 5 आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली। #Delhi #UmarKhalid #SharjeelImam pic.twitter.com/96jrp8oHCp
— Daily 24 Bharat (@Daily24bharat) January 5, 2026
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर उपलब्ध अभियोजन सामग्री के आधार पर उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ प्रथम दृष्टया आरोप स्थापित होते हैं, और यूएपीए के तहत तय सीमा उनके लिए लागू होती है, इसलिए अदालत ने मौजूदा स्थिति में जमानत पर रिहाई का कोई आधार नहीं पाया. वहीं, गुलफिशा फ़ातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत देने की अनुमति दी गई है. अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत का मतलब यह नहीं कि आरोपों में कोई ढील दी गई है. इन पांचों आरोपियों को सख्त शर्तों के साथ जमानत दी गई है, और यदि शर्तों का उल्लंघन होता है, तो ट्रायल कोर्ट को जमानत रद्द करने का अधिकार होगा.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि मामले की सुनवाई लगातार चलनी चाहिए, ताकि ट्रायल में अनावश्यक देरी न हो. अदालत ने दोनों पक्षों के वरिष्ठ वकीलों और उनकी टीमों द्वारा दी गई सहायता की सराहना भी की. इस फैसले से स्पष्ट होता है कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले में न्यायिक सावधानी बरती है. कोर्ट ने कहा की जमानत बचाव पक्ष के लिए आरोपों का मूल्यांकन करने का मंच नहीं है, और न्यायालय को एक व्यवस्थित जांच करनी होगी. अदालत ने सवाल किया कि क्या जांच से प्रथम दृष्टया अपराध सिद्ध होते हैं और आरोपी की भूमिका अपराध से कितनी संबंधित है.
इस फैसले से यह भी संदेश गया कि आतंकवाद से जुड़े मामलों में अदालतें प्राथमिक साक्ष्यों और आरोपी की भूमिका को गंभीरता से देखती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि हर आरोपी की भूमिका अलग है, और न्याय के लिए इस अंतर को समझना जरूरी है. इस फैसले ने दोनों पक्षों को स्पष्ट संकेत दिया कि न्यायिक प्रक्रिया में किसी भी तरह की देरी को लाभ के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. अदालत ने यह सुनिश्चित किया की गंभीर अपराधों और यूएपीए जैसे कानूनों के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और अनुशासन बनी रहे.
खुशी डैंग, प्रोड्यूसर