डेली24 भारत डेस्क: मध्य हिमालय की ऊंची और दुर्गम पर्वतीय चोटियों पर स्थित अस्थिर ग्लेशियर अब गंभीर पर्यावरणीय चेतावनी के संकेत दे रहे हैं. वैज्ञानिक अध्ययनों और उपग्रह चित्रों के आधार पर यह सामने आया है कि इन क्षेत्रों में मौजूद लटके हुए ग्लेशियर संभावित रूप से बड़े पैमाने पर हिमस्खलन का कारण बन सकते हैं, जो न केवल पहाड़ी इलाकों बल्कि निचले मैदानी क्षेत्रों के लिए भी विनाशकारी साबित हो सकते हैं। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार सहित कई प्रमुख संस्थाओं से जवाब तलब किया है.
एनजीटी ने एक प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर यह मामला उठाया, जिसमें मध्य हिमालय में बदलते भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों के कारण उत्पन्न हो रहे खतरों का विस्तार से उल्लेख किया गया था. रिपोर्ट में बताया गया था कि उत्तराखंड के माणा, बदरीनाथ और हनुमान चट्टी जैसे संवेदनशील क्षेत्र विशेष जोखिम में हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि यहां के अस्थिर ग्लेशियर कभी भी टूटकर नीचे की ओर तेजी से खिसक सकते हैं, जिससे भयंकर हिमस्खलन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है.
उत्तराखण्ड : बदरीनाथ, माणा और हनुमान चट्टी में ग्लेशियरों से तबाही का खतरा। अस्थिर ग्लेशियरों से हिमस्खलन की आशंका National Green Tribunal (NGT) ने लिया संज्ञान। केंद्र सरकार समेत कई एजेंसियों को नोटिस जारी।#Uttarakhand #Glacier #Avalanche pic.twitter.com/sazfDLsZlf
— Daily 24 Bharat (@Daily24bharat) April 27, 2026
एनजीटी की पीठ, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य अफरोज अहमद कर रहे हैं, ने 24 अप्रैल को इस मामले पर सुनवाई करते हुए संबंधित विभागों को नोटिस जारी किया. पीठ ने स्पष्ट किया कि यह अध्ययन उपग्रह चित्रों और डिजिटल एलिवेशन मॉडल जैसी आधुनिक तकनीकों पर आधारित है, जिनके माध्यम से हिमस्खलन के संभावित विस्तार और प्रभाव क्षेत्र का आकलन किया गया है. निष्कर्षों में यह चेतावनी दी गई है कि यदि सबसे खराब स्थिति उत्पन्न होती है, तो यह विनाशकारी प्रवाह बदरीनाथ क्षेत्र सहित कई महत्वपूर्ण बस्तियों तक पहुंच सकता है.
इस मामले को गंभीरता से लेते हुए एनजीटी ने केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, स्वच्छ गंगा राष्ट्रीय मिशन, उत्तराखंड पर्यटन विकास बोर्ड और राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान को प्रतिवादी बनाते हुए विस्तृत जवाब मांगा है. सभी संबंधित संस्थाओं को निर्देश दिया गया है कि वे आगामी सुनवाई की तारीख छह अगस्त से कम से कम एक सप्ताह पहले अपना पक्ष प्रस्तुत करें. यह कदम इस बात का संकेत है कि न्यायालय पर्यावरणीय जोखिमों को लेकर अब अधिक सक्रिय और सतर्क दृष्टिकोण अपना रहा है.
इसी बीच, उत्तराखंड के चमोली जिले से एक और विवाद सामने आया है, जहां सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ है. इस वीडियो को बदरीनाथ स्थित तप्त कुंड का बताया जा रहा था, जिसमें पुरुष और महिलाएं एक साथ स्नान करते दिखाई दे रहे हैं. वीडियो में कथित तौर पर अनुचित व्यवहार और छेड़छाड़ के आरोप भी लगाए गए थे, जिससे स्थानीय स्तर पर हड़कंप मच गया.
हालांकि, चमोली पुलिस ने इस वायरल वीडियो का खंडन करते हुए स्पष्ट किया है कि यह वीडियो बदरीनाथ तप्त कुंड का नहीं है. पुलिस के अनुसार, कुंड में पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग स्नान की व्यवस्था है और वहां सुरक्षा के कड़े इंतजाम रहते हैं. पुलिस ने यह भी बताया कि गलत सूचना फैलाने वालों की पहचान की जा रही है और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी. इस घटना ने एक बार फिर सोशल मीडिया पर बिना पुष्टि के जानकारी साझा करने के खतरों को उजागर किया है.
मध्य हिमालय में बढ़ते पर्यावरणीय असंतुलन और अस्थिर ग्लेशियरों का खतरा केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर गंभीर चिंता का विषय बन चुका है. एनजीटी की सक्रियता इस बात का संकेत है कि अब पर्यावरणीय सुरक्षा को लेकर संस्थागत सतर्कता बढ़ रही है. वहीं, सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही भ्रामक सूचनाएं भी एक अलग चुनौती के रूप में सामने आ रही हैं, जिनसे निपटने के लिए जिम्मेदार और जागरूक दृष्टिकोण आवश्यक है. ऐसे समय में वैज्ञानिक अनुसंधान, सरकारी निगरानी और जन-जागरूकता मिलकर ही इस बढ़ते खतरे को कम कर सकते हैं.
खुशी डैंग, प्रोड्यूसर