डेली24भारत डेस्क: 2022 में जब आम आदमी पार्टी (AAP) ने पंजाब से अपने राज्यसभा उम्मीदवारों के नाम घोषित किए, तो राजनीतिक गलियारों में कई बड़े नाम चर्चा में थे—अशोक मित्तल और हरभजन सिंह जैसे चेहरे सुर्खियों में थे। लेकिन असली जिज्ञासा जिस नाम को लेकर थी, वह था—संदीप पाठक। एक ऐसा चेहरा, जो न तो टीवी डिबेट्स में दिखता था, न ही बड़े मंचों पर भाषण देता था, लेकिन पार्टी के भीतर उसकी पकड़ बेहद मजबूत मानी जाती थी।
लो-प्रोफाइल लेकिन हाई-इम्पैक्ट नेता
2016 में AAP से जुड़ने के बाद संदीप पाठक ने हमेशा पर्दे के पीछे रहकर काम करना चुना। उनकी यही रणनीति उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाती थी। जहां कई नेता जनता के बीच अपनी छवि बनाने में जुटे रहते हैं, वहीं पाठक ने संगठन के भीतर अपनी भूमिका को मजबूत किया। उनका लो-प्रोफाइल रहना दरअसल उनकी ताकत बन गया—वे बिना शोर किए पार्टी की रणनीति गढ़ने वाले “मास्टरमाइंड” के रूप में उभरे।
AAP के लिए बड़ा झटका क्यों?
हाल ही में जब पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों के भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने की खबर आई, तो AAP के भीतर हलचल मच गई। हालांकि राघव चड्ढा और स्वाति मालीवाल जैसे नेताओं के अलग होने की अटकलें पहले से थीं, लेकिन संदीप पाठक का जाना पार्टी के लिए सबसे बड़ा झटका माना गया।
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, पाठक सिर्फ एक सांसद नहीं थे—वे संगठन की “रणनीतिक रीढ़” थे। उनके जाने से न केवल नेतृत्व में खालीपन आया है, बल्कि चुनावी रणनीतियों और जमीनी नेटवर्क पर भी असर पड़ने की आशंका है।
कोर ग्रुप में मजबूत पकड़
संदीप पाठक को अरविंद केजरीवाल का बेहद करीबी माना जाता रहा है। 2018 से ही वे AAP के कोर ग्रुप का हिस्सा थे—यानी पार्टी के सबसे अहम फैसलों में उनकी सीधी भागीदारी थी।
2022 में उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया और वे राजनीतिक मामलों की समिति (PAC) के भी सदस्य रहे, जो AAP की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था है। यह दिखाता है कि संगठन में उनका कद कितना बड़ा था।
चुनावी जीत के पीछे का दिमाग
पंजाब में AAP की ऐतिहासिक जीत के पीछे जिस रणनीति को सबसे ज्यादा श्रेय दिया गया, उसमें संदीप पाठक का नाम प्रमुख रहा। उन्होंने डेटा-आधारित चुनावी सर्वे, बूथ मैनेजमेंट और ग्राउंड लेवल कैडर को मजबूत करने पर खास ध्यान दिया।
उनका राजनीतिक सफर दिल्ली डायलॉग कमीशन से शुरू हुआ, जहां उन्होंने आशीष खेतान के साथ काम किया। इसके बाद पंजाब और गुजरात में चुनावी रणनीतियों पर काम करके उन्होंने केजरीवाल का भरोसा जीत लिया।
निजी कारण या राजनीतिक रणनीति?
AAP के कुछ सूत्रों का मानना है कि संदीप पाठक के बीजेपी में जाने के पीछे निजी कारण भी हो सकते हैं। बताया जाता है कि उनके पिता भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुए हैं और छत्तीसगढ़ में सक्रिय पदाधिकारी हैं।
हालांकि, यह भी संभव है कि यह कदम सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि एक बड़ी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो—जहां बदलते समीकरणों के बीच नेता अपने भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश करते हैं।
संदीप पाठक का जाना AAP के लिए सिर्फ एक और “डिफेक्शन” नहीं है, बल्कि संगठन के उस स्तंभ का हटना है, जो पर्दे के पीछे रहकर पार्टी की दिशा तय करता था।
राजनीति में अक्सर चमकदार चेहरे सुर्खियां बटोरते हैं, लेकिन असली खेल उन लोगों के हाथ में होता है जो रणनीति बनाते हैं। संदीप पाठक उन्हीं में से एक थे—और यही वजह है कि उनका जाना AAP के लिए एक गहरा झटका माना जा रहा है।
भावना सिंह, प्रोड्यूसर