डेली24भारत डेस्क: इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना शामिल थे, ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक महत्वपूर्ण और स्पष्ट टिप्पणी दी। अदालत ने कहा कि अदालत का मुख्य काम समाजिक या पारिवारिक नैतिकता के आधार पर निर्णय लेना नहीं है, बल्कि केवल कानून के दायरे में ही फैसले सुनाना है। यदि कोई कार्य कानून के अनुसार अपराध नहीं है, तो सिर्फ समाज की सोच या परंपराओं की वजह से उसे गलत नहीं ठहराया जा सकता।
शादीशुदा पुरुष का लिव-इन में रहना अपराध नहीं
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि कोई शादीशुदा पुरुष किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहता है, तो यह अपने आप में कोई आपराधिक कृत्य नहीं है। अदालत ने यह भी जोर दिया कि जब तक किसी कानून का उल्लंघन नहीं हो रहा, तब तक यह रिश्ता अपराध के दायरे में नहीं आता।
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला। शादीशुदा पुरुष का लिव-इन में रहना अपराध नहीं। सामाजिक नैतिकता कानून से ऊपर नहीं। वयस्कों की सहमति से संबंध अपराध नहीं। सुरक्षा की मांग को लेकर कपल ने दी थी याचिका। महिला के परिवार से धमकी का आरोप। कोर्ट ने पुलिस को सुरक्षा देने के दिए… pic.twitter.com/hlmDc85XOm
— Daily 24 Bharat (@Daily24bharat) March 27, 2026
मामला और पृष्ठभूमि
यह मामला एक ऐसे कपल से जुड़ा था, जिन्हें महिला के परिवार की तरफ से लगातार धमकियां मिल रही थीं। महिला ने शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक को आवेदन देकर बताया कि वह पूरी तरह से बालिग है और अपनी मर्जी से अपने साथी के साथ रह रही है। उसने यह भी कहा कि उसके माता-पिता और अन्य रिश्तेदार उनके रिश्ते से नाराज हैं और जान से मारने की धमकी दे रहे हैं।
महिला ने अपने आवेदन में यह भी आशंका जताई कि उन्हें और उनके साथी को ऑनर किलिंग का खतरा है। इसके बावजूद स्थानीय पुलिस ने इस गंभीर खतरे के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की, जिस पर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई।
पुलिस की जिम्मेदारी और सुरक्षा
हाईकोर्ट ने साफ किया कि दो वयस्क लोग यदि अपनी इच्छा से साथ रहना चाहते हैं, तो उनकी सुरक्षा करना पुलिस का दायित्व है। ऐसे मामलों में पुलिस अधीक्षक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी बनती है कि वह कपल की जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करें। अदालत ने यह भी कहा कि अगर पुलिस लापरवाही करती है, तो उसकी जवाबदेही तय की जाएगी।
अपहरण और कोर्ट का आदेश
महिला के परिवार की शिकायत पर उनके खिलाफ अपहरण का केस भी दर्ज किया गया था। हाईकोर्ट ने इस मामले में कपल को बड़ी राहत दी। अदालत ने आदेश दिया कि अगली सुनवाई तक दोनों याचिकाकर्ताओं को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।
परिवार को रोकने का निर्देश
कोर्ट ने महिला और उसके साथी के परिवार को स्पष्ट निर्देश दिए कि वे कपल को किसी भी तरह से परेशान न करें। न उनसे संपर्क करें, न उनके घर में घुसने की कोशिश करें। किसी भी तरह की धमकी या नुकसान होने पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी गई।
यह निर्णय सामाजिक रूढ़िवादिता और कानून के बीच की खाई को दर्शाता है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि वयस्कों के बीच सहमति आधारित संबंध कोई अपराध नहीं है, और पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि ऐसे लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। यह आदेश न केवल इस कपल के लिए सुरक्षा की गारंटी है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक संदेश भी है कि कानून और व्यक्तिगत स्वतंत्रता समाज की परंपराओं या नैतिकता से ऊपर है।
भावना सिंह, प्रोड्यूसर