डेली24भारत डेस्क: पश्चिम बंगाल की सियासत इस समय अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। दो चरणों के मतदान से पहले चुनाव प्रचार अपने चरम पर है और हर राजनीतिक दल की रणनीति का केंद्र बन चुकी हैं—महिला वोटर। सवाल यही है कि आखिर बंगाल की “आधी आबादी” किसके साथ जाएगी? क्योंकि सत्ता की चाबी अब उन्हीं के हाथ में मानी जा रही है।
राज्य में सत्तारूढ़ ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) और विपक्षी भाजपा के बीच मुकाबला जितना राजनीतिक है, उतना ही महिला वोट बैंक की पकड़ का भी है। यही वजह है कि दोनों दल महिलाओं के लिए योजनाओं, नारों और आरोप-प्रत्यारोप के जरिए माहौल बनाने में जुटे हैं।
पीएम मोदी का हमला—महिला आरक्षण पर सियासी तकरार तेज
चुनावी रैलियों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला आरक्षण विधेयक को लेकर विपक्ष पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि TMC और कांग्रेस ने मिलकर महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाले कानून को रोकने की कोशिश की।
प्रधानमंत्री ने कहा कि
“टीएमसी नहीं चाहती थी कि बंगाल की बेटियां विधायक और सांसद बनें, क्योंकि वे उनके महा जंगलराज को चुनौती दे रही थीं।”
इस बयान के बाद बंगाल की राजनीति में महिला सशक्तिकरण बनाम महिला सुरक्षा का मुद्दा और तेज हो गया है।
बीजेपी के लिए महिला वोटरों को साधना क्यों आसान नहीं?
भले ही पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 77 सीटें जीतकर खुद को मजबूत विपक्ष के रूप में स्थापित किया था, लेकिन सत्ता से अभी भी दूरी बनी हुई है। इस बार पार्टी की नजर सीधे महिला वोटरों पर है—फिर भी रास्ता आसान नहीं दिख रहा।
TMC की मजबूत महिला-केंद्रित योजनाएं
ममता सरकार की लक्ष्मी भंडार योजना महिलाओं के बीच बेहद लोकप्रिय रही है। 2021 के चुनाव में इस योजना ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। इसके जवाब में भाजपा ने मातृ शक्ति वंदन योजना के तहत महिलाओं को हर महीने 3000 रुपये देने का वादा किया है।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अभी तक भाजपा की योजना TMC की योजनाओं जितना भावनात्मक जुड़ाव नहीं बना पाई है।
“बंगाल की बेटी” वाली छवि—ममता की सबसे बड़ी ताकत
ममता बनर्जी की छवि सिर्फ एक मुख्यमंत्री की नहीं, बल्कि “बंगाल की बेटी” की रही है। उनका नारा
“बांग्ला निजेर मेयेके चाय”
महिलाओं के बीच गहराई से जुड़ा हुआ है।
यही वजह है कि भाजपा के पास अभी तक ऐसा कोई स्थानीय महिला चेहरा नहीं है जो इस प्रभाव को चुनौती दे सके।
मुस्लिम महिला वोटरों तक सीमित पहुंच
पश्चिम बंगाल की कई विधानसभा सीटों पर मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। माना जाता है कि 2021 के चुनाव में इस वोट बैंक का बड़ा हिस्सा TMC के साथ रहा था। भाजपा के लिए मुस्लिम महिला वोटरों के बीच पैठ बनाना अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
टिकट वितरण में भी दिखी रणनीतिक बढ़त
इस बार TMC ने 52 महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, जबकि भाजपा ने 33 महिलाओं को टिकट दिया है। प्रतिशत के लिहाज से भाजपा का महिला प्रतिनिधित्व पिछले चुनाव से भी थोड़ा कम है।
राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि टिकट वितरण भी महिला वोटरों को प्रभावित करने का एक बड़ा संकेत होता है।
महिलाओं का भरोसा—TMC की सबसे बड़ी चुनावी ताकत
दिल्ली स्थित Center for the Study of Developing Societies (CSDS) की रिपोर्ट के अनुसार, TMC उन पार्टियों में शामिल है जिन्हें पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का अधिक समर्थन मिलता रहा है।
हालांकि इस बार भाजपा महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे को जोर-शोर से उठा रही है। खासतौर पर आरजी कर मेडिकल कॉलेज से जुड़े विवादों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश की जा रही है।
भाजपा का बड़ा दांव—सीधी आर्थिक मदद का वादा
भाजपा ने अपने घोषणापत्र में वादा किया है कि यदि राज्य में उसकी सरकार बनती है तो गरीब महिलाओं को हर महीने 3000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी। इसके अलावा कई अन्य कल्याणकारी योजनाओं का भी ऐलान किया गया है।
पार्टी को उम्मीद है कि मध्य प्रदेश की लाड़ली बहना योजना, महाराष्ट्र की लाड़की बहिन योजना और बिहार में महिलाओं को सीधे आर्थिक सहायता जैसे प्रयोगों की तरह बंगाल में भी इसका असर दिखाई देगा।
क्या महिला वोटर तय करेंगी बंगाल की सत्ता?
राजनीतिक समीकरणों को देखें तो साफ है कि इस बार पश्चिम बंगाल का चुनाव सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि महिला विश्वास बनाम महिला सुरक्षा के नैरेटिव का भी चुनाव बन चुका है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है— क्या “बंगाल की बेटी” वाली पहचान फिर जीत दिलाएगी?
या फिर आर्थिक सहायता और नए वादों के सहारे भाजपा महिला वोटरों का रुख बदल पाएगी?
इसी सवाल का जवाब तय करेगा कि बंगाल की सत्ता की चाबी आखिर किसके हाथ में जाएगी।
भावना सिंह, प्रोड्यूसर