डेली24भारत डेस्क: केंद्र सरकार ने राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के गायन और प्रस्तुति को लेकर पहली बार विस्तृत और औपचारिक दिशानिर्देश जारी किए हैं। गृह मंत्रालय द्वारा 28 जनवरी को जारी किए गए इस 10 पेज के आदेश की जानकारी अब सार्वजनिक हुई है। इन नए प्रोटोकॉल का उद्देश्य सरकारी और औपचारिक आयोजनों में राष्ट्रगीत के गायन को एक समान, सम्मानजनक और व्यवस्थित तरीके से लागू करना है। निर्देशों में यह स्पष्ट किया गया है कि राष्ट्रगीत के दौरान उपस्थित सभी लोगों का सावधान मुद्रा में खड़ा होना अनिवार्य होगा।
इन दिशानिर्देशों के अनुसार अब सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और अन्य औपचारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम’ बजाया या गाया जाएगा। यदि किसी अवसर पर राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ दोनों प्रस्तुत किए जाते हैं, तो पहले वंदे मातरम गाया जाएगा और उसके बाद राष्ट्रगान। इस क्रम का पालन सभी आधिकारिक आयोजनों में करना होगा।
‘वंदे मातरम्’ को लेकर सरकार के नए दिशा-निर्देश जारी। सरकारी कार्यक्रमों, सरकारी स्कूलों और अन्य औपचारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम्’ बजाया जाएगा। सम्मान में सभी का खड़ा होना अनिवार्य। राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान साथ बजने पर ‘वंदे मातरम्’ पहले बजेगा। राष्ट्रगीत के सभी 6 अंतरे गाए… pic.twitter.com/a8IvgH4CKU
— Daily 24 Bharat (@Daily24bharat) February 11, 2026
स्कूलों के लिए विशेष नियम
नई गाइडलाइन में स्कूलों के लिए अलग से प्रावधान किया गया है। अब सभी स्कूलों में दिन की शुरुआत राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के सामूहिक गायन या वादन से होगी। खास बात यह है कि अब तक जहां केवल पहले दो अंतरे गाए जाते थे, वहीं नए नियमों के तहत राष्ट्रगीत के सभी छह अंतरे गाए जाएंगे। इनकी कुल अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकेंड बताई गई है। मंत्रालय ने निर्देश दिया है कि केवल आधिकारिक रूप से स्वीकृत संस्करण का ही उपयोग किया जाए।
किन-किन मौकों पर अनिवार्य होगा वंदे मातरम
गृह मंत्रालय के आदेश में कई आधिकारिक अवसरों का उल्लेख किया गया है, जहां वंदे मातरम बजाना या गाना अनिवार्य होगा। इनमें शामिल हैं:
- तिरंगा फहराने के कार्यक्रम
- राष्ट्रपति के आगमन के अवसर
- राष्ट्रपति के राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले और बाद
- राज्यपालों के आगमन और भाषण से पहले और बाद
- सिविलियन पुरस्कार समारोह (जैसे पद्म पुरस्कार)
- ऐसे कार्यक्रम जिनमें राष्ट्रपति की उपस्थिति हो
इसके अलावा, मंत्रियों या अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तियों की मौजूदगी वाले गैर-औपचारिक लेकिन महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में भी राष्ट्रगीत का सामूहिक गायन किया जा सकता है, बशर्ते पूरा सम्मान और शिष्टाचार बनाए रखा जाए।
मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि किन-किन मौकों पर राष्ट्रगीत गाया जा सकता है, इसकी पूरी सूची देना संभव नहीं है, इसलिए आयोजक परिस्थितियों और गरिमा के अनुरूप निर्णय ले सकते हैं।
सिनेमा हॉल को मिली छूट
नए नियमों में सिनेमा हॉल को इन अनिवार्य प्रावधानों से बाहर रखा गया है। यानी अब सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले वंदे मातरम बजाना या दर्शकों का खड़ा होना अनिवार्य नहीं होगा। यदि किसी न्यूजरील या डॉक्यूमेंट्री फिल्म के हिस्से के रूप में राष्ट्रगीत आता है, तब भी दर्शकों के लिए खड़ा होना जरूरी नहीं माना गया है। मंत्रालय का तर्क है कि ऐसा करने से प्रदर्शन में व्यवधान और अव्यवस्था हो सकती है।
150 साल पूरे होने पर विशेष महत्व
सरकार इस समय वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में देशभर में कार्यक्रम आयोजित कर रही है। इसी क्रम में गणतंत्र दिवस परेड की थीम भी ‘वंदे मातरम’ रखी गई थी। कर्तव्य पथ पर निकली संस्कृति मंत्रालय की झांकी — “वंदे मातरम: एक राष्ट्र की आत्मा की पुकार” — को मंत्रालयों और विभागों की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ झांकी का पुरस्कार मिला। झांकी में बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा गीत की रचना, औपनिवेशिक काल की रिकॉर्डिंग और नई पीढ़ी द्वारा इसके गायन का प्रस्तुतीकरण दिखाया गया।
वंदे मातरम का ऐतिहासिक महत्व
‘वंदे मातरम’ की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने 7 नवंबर 1875 को की थी। यह गीत 1882 में उनके उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार सार्वजनिक मंच से गाया, जिसके बाद यह राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन गया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह गीत आंदोलनकारियों का प्रमुख नारा बना।
‘वंदे मातरम’ संस्कृत का वाक्यांश है, जिसका अर्थ है — हे मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं।
ऐतिहासिक विवाद और संशोधन
1937 में वंदे मातरम के कुछ अंशों को लेकर विवाद हुआ था। उस समय आशंका जताई गई कि गीत की कुछ पंक्तियां मुस्लिम समुदाय को असहज कर सकती हैं और भाषा भी कठिन है। जवाहरलाल नेहरू ने इस विषय पर सुभाष चंद्र बोस को पत्र लिखा था और रवींद्रनाथ टैगोर से सलाह लेने की बात कही थी। बाद में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने मूल छह पैरा में से चार पैरा हटाने का निर्णय लिया था। उस बैठक में गांधी, नेहरू, पटेल, बोस, राजेंद्र प्रसाद और मौलाना आजाद सहित कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे।
हालिया राजनीतिक बहस
पिछले शीतकालीन सत्र में संसद में वंदे मातरम पर विशेष चर्चा हुई थी, जिसमें राजनीतिक विवाद भी देखने को मिला। सरकार और विपक्ष के बीच इसे लेकर आरोप-प्रत्यारोप हुए। प्रधानमंत्री ने भी लोकसभा में अपने संबोधन में वंदे मातरम के इतिहास और उसके साथ हुए व्यवहार पर टिप्पणी की थी।
भावना सिंह, प्रोड्यूसर