Daily 24 भारत डेस्क: सुप्रीम कोर्ट के एक ताज़ा फ़ैसले ने देश की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला अरावली को लेकर नई बहस छेड़ दी है. नवंबर 2025 में कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की एक समान परिभाषा को मंज़ूरी दी है. सरकार इसे संरक्षण की दिशा में कदम बता रही है, लेकिन पर्यावरणविद चेतावनी दे रहे हैं कि इससे अरावली का बड़ा हिस्सा संरक्षण से बाहर हो सकता है. सवाल यह है कि क्या इसका असर सिर्फ राजस्थान और दिल्ली-NCR तक सीमित रहेगा, या खतरे की आंच हिमालय तक पहुंचेगी?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंज़ूर की गई नई परिभाषा के मुताबिक, आसपास की ज़मीन से 100 मीटर या उससे ज़्यादा ऊंची कोई भी भू-आकृति अरावली पहाड़ी मानी जाएगी. वहीं, अगर ऐसी दो या उससे ज़्यादा पहाड़ियां 500 मीटर के दायरे में होंगी, तो उन्हें अरावली रेंज कहा जाएगा.यह परिभाषा केंद्र सरकार की समिति की सिफारिश पर आधारित है, लेकिन पर्यावरणविदों का कहना है कि इससे अरावली क्षेत्र का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकता है.
अरावली पर्वतमाला सिर्फ एक पहाड़ी श्रृंखला नहीं, बल्कि थार रेगिस्तान और इंडो-गंगेटिक–हिमालयी क्षेत्र के बीच एक प्राकृतिक ‘डस्ट बैरियर’ है. इसकी चट्टानी बनावट और घने जंगल हवा की रफ्तार को कम करते हैं, जिससे धूल और रेत हिमालय तक पहुंचने से पहले ही मैदानों में बैठ जाती है.अगर खनन, वनों की कटाई और लैंड-यूज में बदलाव तेज़ होते हैं, तो यह प्राकृतिक अवरोध कमजोर पड़ सकता है.“अगर अरावली कमजोर हुई तो थार रेगिस्तान पूर्व की ओर फैलेगा. हवा से मिट्टी का कटाव बढ़ेगा और धूल का प्रवाह उत्तर भारत से होते हुए हिमालय तक पहुंचेगा. यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि साइंटिफिक स्टडीज़ से साबित प्रक्रिया है.”
विशेषज्ञों के मुताबिक, इसका असर सिर्फ राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली-NCR तक सीमित नहीं रहेगा. बढ़ती धूल से हिमालयी ग्लेशियरों पर जमाव बढ़ सकता है, जिससे उनके पिघलने की रफ्तार तेज़ हो सकती है. यही वजह है कि अब अरावली के संरक्षण को लेकर #SaveAravalli अभियान और तेज़ हो गया है. सवाल यही है कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बने? क्योंकि अरावली का कमजोर होना सिर्फ एक पर्वत श्रृंखला का नुकसान नहीं, बल्कि उत्तर भारत की जलवायु और हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए बड़ा खतरा बन सकता है.