डेली24 भारत डेस्क: बीते कुछ सालों से उत्तर भारत, विशेषकर दिल्ली-NCR, वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रहा है. हर साल सर्दियों के आते ही धुंध और जहरीली हवा आम जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित करने लगती है. हवा की गुणवत्ता सूचकांक (AQI) लगातार खतरनाक स्तर पर पहुंच रहा है, जिससे न केवल दैनिक जीवन बाधित हो रहा है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य पर भी इसका गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ रहा है. अब स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस समस्या को भारत के लिए कोविड-19 महामारी के बाद सबसे बड़ा स्वास्थ्य संकट मान रहे हैं.
ब्रिटेन में कार्यरत भारतीय मूल के श्वसन और हृदय रोग विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि वायु प्रदूषण को लेकर तुरंत और ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में हालात और भी भयावह हो सकते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि देश में श्वसन संबंधी बीमारियों का एक “छिपा हुआ संकट” धीरे-धीरे विकराल रूप ले रहा है, जिसे अभी तक न तो पूरी तरह पहचाना गया है और न ही इसके समाधान के लिए पर्याप्त प्रयास किए जा रहे हैं.
लिवरपूल के सलाहकार श्वसन रोग विशेषज्ञ और भारत की कोविड-19 सलाहकार समिति के पूर्व सदस्य के अनुसार, वर्षों तक प्रदूषित हवा में सांस लेने के कारण उत्तर भारत की बड़ी आबादी पहले ही नुकसान झेल चुकी है. वे कहते हैं कि हाल में उठाए गए कदम नाकाफी हैं और अब केवल प्रदूषण नियंत्रण उपायों से काम नहीं चलेगा. फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों की एक “धीमी आपात स्थिति” सामने आ रही है, जिसके लिए तत्काल पहचान, नियमित जांच और सुनियोजित इलाज की आवश्यकता है. उन्होंने नीति निर्धारकों से तेजी से काम करने वाले एक विशेष कार्यदल के गठन की भी अपील की है.
चिकित्सकों के अनुसार, दिसंबर महीने में दिल्ली के अस्पतालों में श्वसन संबंधी रोगियों की संख्या में 20 से 30 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है. चिंताजनक बात यह है कि इनमें बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है, जिन्हें पहले कभी इस तरह की समस्या नहीं हुई थी. डॉ. गौतम का कहना है कि भारत ने तपेदिक जैसी गंभीर बीमारी से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य कार्यक्रम चलाकर सफलता हासिल की है, और अब उसी तरह की गंभीरता श्वसन रोगों के लिए भी दिखाने की जरूरत है.
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— Daily 24 Bharat (@Daily24bharat) December 27, 2025
लंदन के सेंट जॉर्ज यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के मानद हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. राजय नारायण का कहना है की वायु प्रदूषण और हृदय, श्वसन तथा तंत्रिका संबंधी बीमारियों के बीच अत्यधिक वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद हैं. उनके अनुसार, पिछले एक दशक में हृदय रोगों में हुई वृद्धि केवल मोटापे या जीवनशैली के कारण नहीं, बल्कि कारों, विमानों और अन्य शहरी परिवहन से निकलने वाले जहरीले उत्सर्जन का भी इसमें बड़ा योगदान है. यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो यह न केवल स्वास्थ्य बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी भारी बोझ डालेगा.
विशेषज्ञों का कहना है कि सिरदर्द, थकान, हल्की खांसी, गले में खराश, आंखों में जलन, त्वचा पर चकत्ते और बार-बार संक्रमण जैसे लक्षणों को अक्सर लोग मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि ये गंभीर और दीर्घकालिक बीमारियों के शुरुआती संकेत हो सकते हैं.
वायु प्रदूषण अब केवल पर्यावरण की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति बन चुकी है. इससे निपटने के लिए सरकार, स्वास्थ्य तंत्र और समाज-तीनों को मिलकर दीर्घकालिक और प्रभावी रणनीति अपनानी होगी. प्रदूषण नियंत्रण के साथ-साथ श्वसन और हृदय रोगों की समय पर पहचान, उपचार और जन-जागरूकता अत्यंत आवश्यक है. यदि आज ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है.
खुशी डैंग, प्रोड्यूसर