डेली24 भारत डेस्क: पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच जारी उच्च-स्तरीय शांति वार्ता के बीच एक गंभीर और चिंताजनक खुलासा सामने आया है. Strait of Hormuz जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है, पूरी तरह से सुरक्षित रूप से खोला नहीं जा पा रहा है. इसके पीछे किसी राजनीतिक चाल से अधिक एक जटिल तकनीकी समस्या जिम्मेदार बताई जा रही है. यह समस्या न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता पर भी गहरा असर डाल सकती है.
रिपोर्टों के अनुसार, हालिया युद्ध के दौरान ईरान ने जल्दबाजी में Strait of Hormuz में समुद्री बारूदी सुरंगें बिछाई थी. इन सुरंगों को छोटे जहाजों की मदद से समुद्र में छोड़ा गया, लेकिन उनकी सटीक लोकेशन का व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं रखा गया. समस्या यहीं से शुरू होती है. कई सुरंगें ऐसी तकनीक से बिछाई गई, जो समुद्री धाराओं के साथ बहकर अपनी स्थिति बदल लेती हैं. इसका मतलब है कि जो समुद्री रास्ता एक दिन सुरक्षित होता है, वह अगले ही दिन बेहद खतरनाक बन सकता है.
ईरान के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन सुरंगों का पता लगाना और उन्हें सुरक्षित तरीके से हटाना है. इसके लिए अत्याधुनिक माइन-स्वीपिंग तकनीक और विशेष जहाजों की आवश्यकता होती है, जो वर्तमान में ईरान के पास सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं. यही कारण है कि ईरान चाहकर भी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह खोल पाने की स्थिति में नहीं है. इस्लामाबाद में चल रही वार्ता में ईरान के विदेश मंत्री और अमेरिकी उपराष्ट्रपति के बीच इस मुद्दे पर चर्चा जारी है. ईरान ने पहले संकेत दिया था कि जलमार्ग को धीरे-धीरे खोला जाएगा, लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि यह देरी किसी रणनीतिक दबाव का हिस्सा नहीं, बल्कि तकनीकी मजबूरी है. दूसरी ओर, अमेरिकी नेतृत्व ने साफ कर दिया है की जब तक जहाजों की आवाजाही पूरी तरह बहाल नहीं होती, तब तक बातचीत आगे नहीं बढ़ेगी.
फिलहाल, ईरान ने पूरे जलमार्ग को बंद नहीं किया है. उसने एक बेहद संकरा और नियंत्रित रास्ता खोला हुआ है, जिसके माध्यम से सीमित जहाजों को गुजरने की अनुमति दी जा रही है. हालांकि, यह रास्ता भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है, क्योंकि इसके आसपास अभी भी अनजान बारूदी सुरंगों का खतरा बना हुआ है. इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों से ईरान टोल भी वसूल रहा है, जिससे उसे आर्थिक लाभ मिल रहा है. यह स्थिति वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए बेहद संवेदनशील है. दुनिया के कुल तेल और एलएनजी व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत इसी मार्ग से होकर गुजरता है. ऐसे में अगर यह रास्ता पूरी तरह सुरक्षित नहीं होता, तो ऊर्जा आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस की कीमतें बढ़ सकती हैं.
भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं. हालिया युद्धविराम के बाद उम्मीद थी कि खाड़ी क्षेत्र से आपूर्ति सामान्य हो जाएगी, लेकिन माइनफील्ड के खतरे ने शिपिंग कंपनियों और बीमा एजेंसियों को सतर्क कर दिया है. इससे तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है और आपूर्ति में देरी हो सकती है. विशेषज्ञों का मानना है की यदि अमेरिका और उसके सहयोगी देश अपनी उन्नत माइन-स्वीपिंग तकनीक का उपयोग करें, तो भी पूरे क्षेत्र को पूरी तरह सुरक्षित बनाने में हफ्तों या महीनों का समय लग सकता है. तब तक वैश्विक ऊर्जा बाजार अस्थिर बना रह सकता है.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बारूदी सुरंगों का यह संकट केवल एक क्षेत्रीय समस्या नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है. इस चुनौती का समाधान तकनीकी सहयोग, कूटनीतिक प्रयास और धैर्य के साथ ही संभव है.
खुशी डैंग, प्रोड्यूसर