डेली24 भारत डेस्क: भारत की न्यायपालिका से जुड़ा एक बड़ा और विवादास्पद मामला उस समय नया मोड़ लेता दिखा, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. कैश कांड में नाम सामने आने के बाद पहले ही उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने की चर्चा थी, और इसी बीच उनका यह फैसला कई सवालों को जन्म दे रहा है. न्यायपालिका की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर उठे इस विवाद ने देशभर में बहस छेड़ दी है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने दिया इस्तीफा। राष्ट्रपति को सौंपा अपना इस्तीफा। दिल्ली स्थित आवास पर जले हुए कैश मिलने से मचा था विवाद। विवाद के बाद दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद किया गया था तबादला। 5 अप्रैल 2025 को ली थी शपथ। आरोपों को लेकर आंतरिक जांच जारी।… pic.twitter.com/9jswwnchMO
— Daily 24 Bharat (@Daily24bharat) April 10, 2026
जस्टिस वर्मा ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंपते हुए अपने पद से हटने का निर्णय लिया. यह कदम ऐसे समय में आया है जब उनके खिलाफ आरोपों की जांच चल रही थी और संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी भी हो चुकी थी. बताया जा रहा है कि उन्होंने 5 अप्रैल 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में शपथ ली थी, लेकिन विवाद उनके साथ लगातार जुड़ा रहा. पूरा मामला 15 मार्च 2025 को सामने आया था, जब दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास से कथित तौर पर 500 रुपये के जले और अधजले नोट बरामद हुए थे. इस घटना का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसने मामले को और अधिक गंभीर बना दिया. इसके बाद जस्टिस वर्मा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, हालांकि उन्होंने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे साजिश बताया.
मामला जल्द ही न्यायपालिका की सीमाओं से निकलकर संसद तक पहुंच गया। मानसून सत्र के दौरान 145 लोकसभा सांसदों ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश करने की पहल की. इस प्रस्ताव को सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों के सांसदों का समर्थन मिला, जो इस मामले की गंभीरता को दर्शाता है. सांसदों ने संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 218 के तहत कार्रवाई की मांग की और लोकसभा अध्यक्ष को ज्ञापन सौंपा. इस बीच, भारत के मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में 22 मार्च 2025 को एक आंतरिक जांच भी शुरू की गई. जांच के लिए तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों का पैनल गठित किया गया, ताकि आरोपों की निष्पक्षता से जांच की जा सके. हालांकि, जांच पूरी होने से पहले ही सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने जस्टिस वर्मा के तबादले की सिफारिश कर दी.
इसके बाद केंद्र सरकार ने इस सिफारिश को मंजूरी देते हुए उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट स्थानांतरित कर दिया. 5 अप्रैल 2025 को उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में कार्यभार संभाला, लेकिन वहां भी उनके ट्रांसफर को लेकर विवाद जारी रहा. कई कानूनी विशेषज्ञों और संगठनों ने इस कदम पर सवाल उठाए और इसे न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ी गंभीर चिंता बताया. विवाद के बीच यह भी कहा गया कि उनका ट्रांसफर उस घटना से अलग है जिसमें उनके आवास पर आग लगने और नकदी मिलने की बात सामने आई थी. हालांकि, आम जनमानस और राजनीतिक हलकों में इन दोनों घटनाओं को जोड़कर देखा गया, जिससे मामला और उलझता गया.
अब उनके इस्तीफे के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह कदम महाभियोग की प्रक्रिया से बचने के लिए उठाया गया या फिर यह नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करने का संकेत है. कानूनी रूप से देखा जाए तो इस्तीफे के बाद महाभियोग की प्रक्रिया स्वतः समाप्त हो जाती है, जिससे यह मामला एक अलग दिशा में जा सकता है. जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा भारतीय न्यायपालिका के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण बनकर सामने आया है. यह घटना न केवल न्यायिक जवाबदेही और पारदर्शिता की आवश्यकता को रेखांकित करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के आचरण पर लगातार नजर रखना क्यों जरूरी है. आने वाले समय में इस मामले की जांच और इसके निष्कर्ष यह तय करेंगे कि न्यायपालिका की साख को किस तरह बनाए रखा जा सकता है.
खुशी डैंग, प्रोड्यूसर