डेली24 भारत डेस्क: भारत में विदेश में Job करने का क्रेज हर साल बढ़ता ही जा रहा है. यह केवल जॉब की तलाश नहीं, बल्कि बेहतर जीवन और संतुलित काम-काज की चाहत का भी प्रतीक है. आजकल भारतीय पेशेवर हर जगह सुनते हैं कि “वर्क-लाइफ बैलेंस” कितना महत्वपूर्ण है. भारत में, खासकर बड़े शहरों में, यह संतुलन अक्सर टूट जाता है. लंबी ड्यूटी, ट्रैफिक, समय पर नहीं खाया जाने वाला खाना और काम का दबाव, ये सभी चीजें पेशेवरों के जीवन को प्रभावित करती हैं. यही कारण है कि भारतीय जब भी विदेश में काम करने का मौका पाते हैं, तो बिना देर किए वहां जाने का फैसला कर लेते हैं.
हाल ही में लिंक्डइन पर मनुराज गर्ग ने इस बात को बहुत ही सरल और स्पष्ट तरीके से समझाया. उन्होंने अपनी पोस्ट में भारत और ऑस्ट्रेलिया के वर्क-कल्चर की तुलना की. उनके अनुसार, ऑस्ट्रेलिया में जॉब करने का मतलब केवल पैसे कमाना नहीं, बल्कि जीवन का आनंद लेना और व्यक्तिगत समय का सम्मान करना भी है. गर्ग ने उदाहरण के तौर पर बताया कि उनके एक ऑस्ट्रेलियाई दोस्त का दिन शाम 4:30 बजे खत्म हो गया. दोस्त कैफे में अकेला बैठा था, फोन या लैपटॉप नहीं, सिर्फ कॉफी का आनंद ले रहा था. उसके बाद वह घर जाकर परिवार के साथ समय बिताएगा, साइकिल चलाएगा या समुद्र किनारे लंबी सैर करेगा. यह वहां का सामान्य दिनचर्या है, कोई असाधारण घटना नहीं.
इसके विपरीत, भारत में स्थिति काफी अलग है. बड़े शहरों में पेशेवर अक्सर देर रात तक काम में व्यस्त रहते हैं. रात 8:30 बजे तक ऑफिस की लाइट जलती रहती हैं, लोग ट्रैफिक में फंसे होते हैं और व्हाट्सएप या ईमेल चेक करते रहते हैं. रविवार की शाम को भी कई लोग लैपटॉप खोलकर आने वाले हफ्ते की तैयारी में जुट जाते हैं. इस तरह, भारत में काम जिंदगी का केंद्र बन जाता है, जबकि विदेशों में जीवन और काम के बीच संतुलन बनाए रखना प्राथमिकता होती है.
भारतीयों के विदेश जाने के पीछे सिर्फ वर्क-लाइफ बैलेंस ही नहीं है. वहां की कार्यसंस्कृति में इंसानियत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अधिक अहमियत होती है. कर्मचारियों को उनकी दक्षता और काम के परिणाम के आधार पर महत्व दिया जाता है, न कि कितने घंटे वे ऑफिस में बिताते हैं. साथ ही, स्वास्थ्य, मानसिक शांति और परिवार के साथ समय बिताने को भी उतना ही महत्व मिलता है. ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और कई यूरोपीय देशों में यह संस्कृति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जिससे पेशेवरों को एक स्थायी संतुलन मिलता है.
भारत में उच्च शिक्षा और नौकरी की प्रतिस्पर्धा के कारण पेशेवरों पर लगातार दबाव होता है. टियर-1 शहरों में रहने वाले लोग काम के साथ जीवन की बुनियादी जरूरतों के बीच तालमेल नहीं बैठा पाते. जबकि विदेशों में सुविधाएं और काम की संरचना ऐसी होती है कि व्यक्ति को व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन के बीच संतुलन बनाए रखने का अवसर मिलता है. यही कारण है कि भारतीयों के लिए विदेश में नौकरी करना केवल वित्तीय लाभ नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक लाभ का भी विकल्प बन जाता है.
यह कहा जा सकता है की भारतीयों का विदेश में नौकरी करने का क्रेज केवल जॉब की चाहत नहीं है, बल्कि जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने की इच्छा भी है. बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पेशेवर सम्मान, ये तीन मुख्य कारण हैं जो भारतीयों को विदेश की ओर आकर्षित करते हैं. जैसा कि मनुराज गर्ग ने कहा, “ऑस्ट्रेलिया में काम जीवन का हिस्सा है; भारत में जिंदगी काम के इर्द-गिर्द घूमती है।”. यह तुलना भारतीय पेशेवरों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या उन्हें भी अपने काम और जीवन के बीच सही संतुलन ढूंढने की जरूरत है. विदेश में नौकरी करना सिर्फ करियर की छलांग नहीं, बल्कि एक नई जिंदगी अपनाने का तरीका भी है और यही वजह है की भारतीय पेशेवर विदेशों में अवसरों को देखते ही ‘दिवाने’ हो जाते हैं.
खुशी डैंग, प्रोड्यूसर