Daily 24 भारत डेस्क: चीन, जिसे कभी दुनिया की सबसे बड़ी ताकत उसकी विशाल आबादी के कारण माना जाता था, आज उसी आबादी के तेज़ी से घटने की चुनौती से जूझ रहा है. नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, साल 2025 में चीन की जनसंख्या लगातार चौथे साल घटी है. यह केवल आंकड़ों का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि चीन के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक भविष्य को प्रभावित करने वाला बड़ा बदलाव है.
साल 2025 में चीन की कुल आबादी घटकर लगभग 1.405 अरब रह गई. एक ही साल में 33.9 लाख लोगों की कमी दर्ज की गई, जो अब तक की सबसे तेज़ गिरावटों में से एक है. जन्मदर गिरकर प्रति हजार 5.63 पर पहुंच गई, जो 1949 के बाद सबसे निचला स्तर है. वहीं दूसरी ओर मौतों की संख्या बढ़कर 1.13 करोड़ हो गई है. यानी अब चीन में मरने वालों की संख्या, जन्म लेने वालों से कहीं ज़्यादा हो चुकी है.हालात की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि साल 2025 में सिर्फ 79.2 लाख बच्चों का जन्म हुआ, जबकि 2024 में यह संख्या 95.4 लाख थी. महज एक साल में जन्म दर में करीब 17 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्तर लगभग 18वीं सदी के चीन के बराबर है.
जनसंख्या का झुकाव अब तेज़ी से बुजुर्गों की ओर बढ़ रहा है. चीन की लगभग 23 प्रतिशत आबादी 60 साल से अधिक उम्र की हो चुकी है. अनुमान है कि साल 2035 तक बुजुर्गों की संख्या 40 करोड़ तक पहुंच जाएगी. इसका सीधा असर पेंशन सिस्टम, स्वास्थ्य सेवाओं और कार्यबल पर पड़ेगा. इसी दबाव के चलते सरकार को सेवानिवृत्ति आयु बढ़ानी पड़ी है—अब पुरुषों को 63 वर्ष और महिलाओं को 58 वर्ष तक काम करना होगा.इस संकट की जड़ें चीन की कुख्यात एक-बच्चा नीति में भी छिपी हैं, जो 1980 से 2015 तक लागू रही. इस नीति ने आबादी को नियंत्रित तो किया, लेकिन समाज की सोच को स्थायी रूप से बदल दिया. आज की युवा पीढ़ी छोटे परिवार को ही सामान्य मानती है. करियर, महंगाई और जीवनशैली के दबाव में बच्चे पैदा करना उन्हें बोझ लगता है.
विवाह दर में गिरावट ने भी हालात बिगाड़े हैं. साल 2024 में विवाह पंजीकरण में करीब 20 प्रतिशत की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई. हालांकि 2025 में कुछ प्रशासनिक छूटों के कारण अस्थायी सुधार दिखा, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका जन्मदर पर स्थायी असर अभी संदिग्ध है. तेज़ शहरीकरण भी एक बड़ी वजह है. 2005 में जहां 43 प्रतिशत लोग शहरों में रहते थे, वहीं 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 68 प्रतिशत हो गया है. शहरों में महंगा जीवन, शिक्षा और बच्चों की देखभाल की ऊंची लागत युवा दंपतियों को संतान से दूर कर रही है.
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि घटती युवा आबादी का सीधा असर चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. कम श्रमिक, कम उपभोक्ता और कम नवाचार का मतलब है धीमी विकास दर. आने वाले समय में सरकार के सामने मुश्किल विकल्प होंगे-या तो टैक्स बढ़ाए जाएं, या सेवानिवृत्ति आयु और बढ़े, या फिर सार्वजनिक खर्च में कटौती की जाए.निष्कर्ष साफ है-जिस जनसंख्या नियंत्रण को कभी चीन की सफलता माना गया था, वही आज उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है.