डेली24 भारत डेस्क: भारत अपनी रक्षा कूटनीति और वैश्विक हथियार निर्यात क्षमता को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है. रक्षा सूत्रों के अनुसार, भारत वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों के निर्यात के लिए दो बड़े सौदों को अंतिम रूप देने के बेहद करीब पहुंच गया है. इन प्रस्तावित सौदों की कुल अनुमानित कीमत 4,000 करोड़ रुपये से अधिक, यानी लगभग 450 मिलियन अमेरिकी डॉलर बताई जा रही है. यदि ये सौदे सफलतापूर्वक पूरे होते हैं, तो यह न केवल भारत की रक्षा निर्यात क्षमता को मजबूत करेंगे, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया में रणनीतिक संतुलन पर भी गहरा प्रभाव डालेंगे.
ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस के संयुक्त सहयोग से विकसित की गई है, जिसे इंडो-रूसी संयुक्त उद्यम ब्रह्मोस एयरोस्पेस बनाता है. चूंकि इस मिसाइल में रूसी तकनीकी भागीदारी शामिल है, इसलिए किसी तीसरे देश को इसके निर्यात के लिए रूस की सहमति आवश्यक होती है. इस दिशा में एक अहम प्रगति तब हुई जब रूस ने भारत को आश्वासन दिया कि उसे वियतनाम और इंडोनेशिया को ब्रह्मोस मिसाइल बेचने पर कोई आपत्ति नहीं है. यह आश्वासन 4 दिसंबर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उनके रूसी समकक्ष आंद्रेई बेलौसोव के बीच हुई प्रतिनिधिमंडल स्तर की बैठक के दौरान दिया गया. अब भारत को मॉस्को से औपचारिक अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) मिलने का इंतजार है, जिसके बाद इन सौदों को औपचारिक रूप दिया जा सकेगा.
रक्षा अधिकारियों का मानना है कि ये प्रारंभिक सौदे भविष्य में और बड़े ऑर्डरों का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं. एक बार जब वियतनाम और इंडोनेशिया ब्रह्मोस प्रणाली को अपने सशस्त्र बलों में शामिल कर लेंगे और इसका परिचालन अनुभव प्राप्त करेंगे, तो वे अपनी जरूरतों के अनुसार अतिरिक्त मिसाइलों की मांग कर सकते हैं. इन सौदों के बाद वियतनाम और इंडोनेशिया, फिलीपींस के बाद ऐसे अन्य आसियान देश बन जाएंगे जो इस अत्याधुनिक, एयर-ब्रीदिंग सुपरसोनिक मिसाइल प्रणाली को अपनाएंगे.
भारत ने जनवरी 2022 में फिलीपींस के साथ 375 मिलियन डॉलर का एक महत्वपूर्ण समझौता किया था, जिसके तहत तीन एंटी-शिप ब्रह्मोस तटीय रक्षा बैटरियों की आपूर्ति की जानी है. यह भारत द्वारा ब्रह्मोस का पहला बड़ा निर्यात सौदा था, जिसे रक्षा निर्यात के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि माना गया. रिपोर्टों के अनुसार, फिलीपींस भी भविष्य में और अधिक ब्रह्मोस मिसाइलों का ऑर्डर दे सकता है.
इन तीनों देशों—फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया—के सामने एक साझा रणनीतिक चुनौती है: दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामक और विस्तारवादी नीतियां. हाल के वर्षों में फिलीपींस और चीन के बीच टकराव तेजी से बढ़ा है, जबकि वियतनाम और इंडोनेशिया भी अपने समुद्री अधिकारों और क्षेत्रीय संप्रभुता को लेकर दबाव महसूस कर रहे हैं. ऐसे में ब्रह्मोस जैसी तेज, सटीक और शक्तिशाली मिसाइल प्रणाली इन देशों की समुद्री और तटीय रक्षा क्षमताओं को काफी मजबूती प्रदान कर सकती है.
भारत ने हाल के वर्षों में ब्रह्मोस मिसाइल की क्षमताओं में लगातार सुधार किया है. इसकी मारक क्षमता को मूल 290 किलोमीटर से बढ़ाकर लगभग 450 किलोमीटर कर दिया गया है. मई में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों से ब्रह्मोस मिसाइलों को सफलतापूर्वक दागकर गहराई में स्थित लक्ष्यों पर सटीक हमले किए. आगे की योजना के तहत भारत 2028 से लगभग 800 किलोमीटर रेंज वाली उन्नत ब्रह्मोस मिसाइल को शामिल करने की तैयारी कर रहा है. इसके लिए संशोधित रैमजेट इंजन और अन्य तकनीकी उन्नयन के साथ परीक्षण जारी हैं. पिछले कई वर्षों में भारतीय सशस्त्र बलों ने ब्रह्मोस एयरोस्पेस के साथ लगभग 60,000 करोड़ रुपये के अनुबंध किए हैं. आज ब्रह्मोस भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना के लिए एक प्रमुख पारंपरिक (गैर-परमाणु) सटीक प्रहार हथियार प्रणाली बन चुकी है.
ब्रह्मोस के अलावा भारत अन्य स्वदेशी हथियार प्रणालियों के निर्यात पर भी जोर दे रहा है. फिलीपींस, इंडोनेशिया और वियतनाम के साथ-साथ संयुक्त अरब अमीरात और ब्राजील जैसे देशों को आकाश वायु रक्षा मिसाइल प्रणाली और पिनाका मल्टी-लॉन्च रॉकेट सिस्टम की पेशकश की जा रही है. आकाश प्रणाली 25 किलोमीटर तक की दूरी पर दुश्मन के विमान, हेलीकॉप्टर, ड्रोन और सबसोनिक क्रूज मिसाइलों को मार गिराने में सक्षम है. हालांकि भारत अभी भी दुनिया के शीर्ष तीन हथियार आयातक देशों में शामिल है, लेकिन उसकी रक्षा निर्यात क्षमता में तेज़ी से वृद्धि हो रही है. वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने लगभग 24,000 करोड़ रुपये मूल्य के हथियार, गोला-बारूद, रक्षा उप-प्रणालियां और घटक करीब 80 देशों को निर्यात किए. इस दौरान आर्मेनिया, आकाश वायु रक्षा प्रणाली, पिनाका रॉकेट सिस्टम और 155 मिमी तोपों जैसी पूर्ण हथियार प्रणालियों का सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा है.
वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ संभावित ब्रह्मोस सौदे भारत की रक्षा उद्योग यात्रा में एक निर्णायक कदम साबित हो सकते हैं. ये सौदे न केवल भारत की स्वदेशी रक्षा तकनीक पर बढ़ते वैश्विक भरोसे को दर्शाते हैं, बल्कि भारत को एक जिम्मेदार और प्रभावशाली रक्षा निर्यातक के रूप में स्थापित करते हुए इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.
खुशी डैंग, प्रोड्यूसर