डेली24भारत डेस्क: यूपी के ग्रेटर नोएडा स्थित सेक्टर-150 में हुआ यह दर्दनाक कार हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, कमजोर आपातकालीन व्यवस्था और नाकाम रेस्क्यू सिस्टम की भयावह तस्वीर पेश करता है। इस हादसे में जान गंवाने वाले युवक के पिता का दर्द और आक्रोश उन सवालों को जन्म देता है, जिनका जवाब अब तक जिम्मेदार विभाग नहीं दे पाए हैं।
मृतक के पिता के अनुसार, यह हादसा रात करीब 12 बजे हुआ, जब उनके बेटे ने घबराई हुई आवाज़ में फोन कर बताया कि उसकी कार सड़क से फिसलकर नाले में गिर गई है और वह अंदर फंसा हुआ है। बेटे ने यह भी बताया कि कार धीरे-धीरे पानी में डूब रही है। जान बचाने के लिए वह किसी तरह कार से बाहर निकला और छत पर लेट गया, ताकि खुद को संतुलित रख सके और पानी में डूबने से बचा रहे।
फोन कॉल मिलते ही पिता तुरंत बेटे को बचाने के लिए निकल पड़े। लेकिन घना अंधेरा, कोहरा और सड़क किनारे किसी तरह के संकेत या चेतावनी बोर्ड न होने के कारण यह पता लगाना बेहद मुश्किल हो गया कि युवक आखिर किस नाले में फंसा है। पिता को बेटे तक पहुंचने में 30 से 40 मिनट का समय लग गया। इस पूरे दौरान पिता और बेटे के बीच लगातार मोबाइल फोन पर बातचीत होती रही। बेटा हर पल अपनी बिगड़ती हालत के बारे में बता रहा था और मदद की गुहार लगा रहा था।
नोएडा: मॉल के खुले बेसमेंट में डूबकर इंजीनियर की मौत मामले में बड़ी कार्रवाई। CEO लोकेश एम ने लिया विभागीय एक्शन। ट्रैफिक सेल के JE नवीन कुमार सस्पेंड। सेक्टर-150 की निगरानी से जुड़े अफसरों/कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस। घटना वाले दिन ही CEO ने दिए थे जांच के आदेश। जांच के बाद… pic.twitter.com/lopxpRiq0i
— Daily 24 Bharat (@Daily24bharat) January 19, 2026
पिता ने बताया कि उनका बेटा करीब दो घंटे तक मौत से लड़ता रहा। वह लगातार कह रहा था कि गाड़ी और नीचे जा रही है और पानी का स्तर बढ़ता जा रहा है। अपनी पहचान और लोकेशन बताने के लिए उसने मोबाइल की टॉर्च जलाकर रखी थी, ताकि दूर से रोशनी दिखाई दे सके। लेकिन अंधेरा, कोहरा और प्रशासनिक अव्यवस्था उसके लिए जानलेवा साबित हुई।
रेस्क्यू ऑपरेशन को लेकर पिता ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनके अनुसार, मौके पर पहुंची सरकारी रेस्क्यू टीम के पास न तो पर्याप्त संसाधन थे और न ही स्पष्ट रणनीति। टीम केवल रस्सी के सहारे युवक तक पहुंचने की कोशिश करती रही, लेकिन सही जगह तक नहीं पहुंच सकी। पिता का कहना है कि जब एक तरीका काम नहीं कर रहा था, तो नाव, गोताखोर, तैराक या अन्य वैकल्पिक साधनों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया।
इस हादसे ने यह भी उजागर किया कि यह स्थान पहले से ही बेहद खतरनाक था। पिता ने बताया कि कुछ सप्ताह पहले एक ट्रक भी इसी नाले में गिर गया था, जिसके चालक की जान किसी बाहरी व्यक्ति ने बड़ी मुश्किल से बचाई थी। इसके बावजूद प्रशासन ने न तो बैरियर लगाए, न रिफ्लेक्टर, न चेतावनी बोर्ड और न ही सड़क सुरक्षा के कोई ठोस इंतजाम किए। घने कोहरे में सड़क और नाले के बीच फर्क करना लगभग असंभव था, और इसी वजह से कार सीधे नाले में जा गिरी।
घटना के बाद जब 112 नंबर पर कॉल की गई, तो करीब 22 मिनट बाद पुलिस और क्रेन मौके पर पहुंची। उस समय भी युवक से संपर्क बना हुआ था और वह आवाज देकर जवाब दे रहा था। इसके बाद फायर ब्रिगेड को बुलाया गया, लेकिन उनके पास भी प्रभावी रेस्क्यू के लिए जरूरी संसाधनों का अभाव था। आखिरकार शाम करीब 6 बजे एसडीआरएफ की टीम पूरी तैयारी के साथ मौके पर पहुंची और रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। युवक की मौत हो चुकी थी और पूरा अभियान केवल शव बरामदगी तक सीमित रह गया।
पीड़ित परिवार ने इस मामले में थाने में शिकायत दर्ज कराई है, जिसके बाद पुलिस ने केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। मृतक के पिता का कहना है कि वे यह लड़ाई सिर्फ अपने बेटे के लिए नहीं, बल्कि उन तमाम परिवारों के लिए लड़ रहे हैं, जो भविष्य में ऐसी प्रशासनिक लापरवाही और सिस्टम की विफलता का शिकार हो सकते हैं। उनका सवाल साफ है—अगर समय रहते सही संसाधन, तत्परता और जिम्मेदारी दिखाई जाती, तो क्या एक युवा की जान नहीं बचाई जा सकती थी?
भावना सिंह, प्रोड्यूसर