डेली24 भारत डेस्क: भारतीय राजनीति में महिला आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में आ गया है. संसद के विशेष सत्र के दौरान संविधान संशोधन से जुड़ा प्रस्ताव पारित न हो पाने के बाद सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बयानबाजी देखने को मिली. इसी क्रम में कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने केंद्र सरकार को खुली चुनौती देते हुए कहा कि वह पुराने महिला आरक्षण विधेयक को फिर से संसद में पेश करे, जिसे पहले व्यापक राजनीतिक समर्थन प्राप्त था. उनका यह बयान न केवल राजनीतिक बहस को तेज करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि महिलाओं के प्रतिनिधित्व का प्रश्न अब भी भारतीय लोकतंत्र के केंद्र में अधूरा पड़ा है.
प्रियंका गांधी का केंद्र पर तीखा हमला- “महिलाएं मूर्ख नहीं, गुमराह करना बंद करें”। सरकार की नीतियों पर साधा निशाना। महिलाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर उठाए सवाल।@priyankagandhi @INCIndia #PriyankaGandhi #Congress #WomenEmpowerment pic.twitter.com/3BNlWG8aTi
— Daily 24 Bharat (@Daily24bharat) April 18, 2026
प्रियंका गांधी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकार को बिना किसी शर्त के पुराने विधेयक को वापस लाना चाहिए और तुरंत संसद बुलाकर उसे पारित कराना चाहिए. उनका कहना था कि यदि सरकार वास्तव में महिलाओं के अधिकारों को लेकर गंभीर है, तो उसे किसी अतिरिक्त प्रक्रिया या शर्तों के बिना सीधे आरक्षण लागू करना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि उस स्थिति में सभी विपक्षी दल सरकार का समर्थन करेंगे और तब यह साफ हो जाएगा कि वास्तव में महिला विरोधी कौन है.
यह पूरा विवाद उस नए प्रस्ताव को लेकर खड़ा हुआ, जिसमें महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को परिसीमन और जनगणना की प्रक्रिया से जोड़ दिया गया था. विपक्ष का तर्क है कि इस शर्त के कारण आरक्षण लागू होने में अनिश्चितकालीन देरी हो सकती है. उनके अनुसार, यह एक तरह से महिला आरक्षण को टालने की रणनीति है, जबकि सत्तापक्ष का कहना है कि यह एक आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रिया है जिससे प्रतिनिधित्व को संतुलित और न्यायसंगत बनाया जा सके.
लोकसभा में इस विधेयक को पारित करने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका. हालांकि इसके पक्ष में पर्याप्त संख्या में वोट पड़े, लेकिन विरोध में भी बड़ी संख्या सामने आई, जिसके चलते यह प्रस्ताव गिर गया. इसके बाद सरकार ने इससे जुड़े अन्य प्रस्तावों को भी आगे न बढ़ाने का फैसला लिया. इस घटनाक्रम ने संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है.
सत्तारूढ़ पक्ष ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि उन्होंने एक ऐतिहासिक अवसर को गंवा दिया और महिलाओं को उनका अधिकार देने में बाधा डाली. वहीं विपक्ष का कहना है कि वह महिला आरक्षण के सिद्धांत के साथ पूरी तरह खड़ा है, लेकिन वह इसे जटिल शर्तों से जोड़ने के खिलाफ है. उनका मानना है कि यदि वास्तव में महिलाओं को सशक्त बनाना है, तो इसे तुरंत और बिना शर्त लागू किया जाना चाहिए.
यह बहस केवल एक विधेयक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की उस व्यापक चुनौती को उजागर करती है जिसमें प्रतिनिधित्व, समानता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का संतुलन शामिल है. महिला आरक्षण का मुद्दा वर्षों से लंबित रहा है और हर बार किसी न किसी कारण से यह अंतिम चरण तक पहुंचकर रुक जाता है.
यह सवाल बना रहता है कि क्या राजनीतिक दल इस मुद्दे पर वास्तविक सहमति बना पाएंगे या यह केवल आरोप-प्रत्यारोप का विषय बना रहेगा. प्रियंका गांधी की चुनौती ने इस बहस को एक नया आयाम दिया है और अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है. यदि सभी पक्ष वास्तव में महिलाओं के हित में एकजुट होते हैं, तो यह भारतीय राजनीति के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है.
खुशी डैंग, प्रोड्यूसर