डेली24 भारत डेस्क: अमेरिकी व्यापार नीति एक बार फिर वैश्विक सुर्खियों में है. Supreme Court of the United States द्वारा राष्ट्रपति Donald Trump के व्यापक वैश्विक टैरिफ को अवैध करार दिए जाने के बाद ट्रंप प्रशासन ने तुरंत नई रणनीति अपनाते हुए एक नया कार्यकारी आदेश जारी कर दिया है. इस आदेश के तहत भारत सहित सभी देशों से अमेरिका में होने वाले आयात पर 10 प्रतिशत का अस्थायी टैरिफ लगाया गया है. सुप्रीम कोर्ट का 6-3 के बहुमत से आया फैसला ट्रंप की व्यापार नीति के लिए बड़ा झटका माना गया, लेकिन इसके तुरंत बाद उठाए गए इस कदम ने संकेत दे दिया कि प्रशासन अपने संरक्षणवादी एजेंडे से पीछे हटने को तैयार नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा की राष्ट्रपति द्वारा लगाए गए व्यापक वैश्विक टैरिफ कानूनी दायरे से बाहर थे. इस फैसले को ट्रंप ने भयानक बताते हुए इसकी तीखी आलोचना की और कुछ ही घंटों में 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत नया आदेश जारी कर दिया. यह प्रावधान भुगतान संतुलन के घाटे को दूर करने के उद्देश्य से 150 दिनों तक अधिकतम 15 प्रतिशत तक अस्थायी आयात अधिभार लगाने की अनुमति देता है. ट्रंप ने इसी कानूनी प्रावधान का सहारा लेते हुए 10 प्रतिशत का सार्वभौमिक टैरिफ लागू कर दिया.
व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया है की यह 10 प्रतिशत टैरिफ तब तक लागू रहेगा जब तक कि किसी अन्य कानूनी अधिकार के तहत नई व्यवस्था लागू नहीं की जाती. एक अधिकारी ने बताया की भारत सहित सभी व्यापारिक साझेदारों को यह शुल्क देना होगा. हालांकि प्रशासन भविष्य में “अधिक उपयुक्त या पूर्व-निर्धारित टैरिफ दरों” को लागू करने के विकल्प तलाशने की बात भी कह रहा है. इसका अर्थ यह है कि 10 प्रतिशत का यह टैरिफ फिलहाल एक अंतरिम कदम है, जिसे आगे चलकर बदला जा सकता है.
भारत पर इसका विशेष प्रभाव पड़ेगा. इससे पहले अमेरिका और भारत के बीच एक अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा पर सहमति बनी थी. उस समझौते के तहत भारत पर लगने वाला 25 प्रतिशत दंडात्मक टैरिफ जो रूसी तेल खरीद के संदर्भ में लगाया गया था हटा दिया गया था और सामान्य ड्यूटी को घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया था. अब नए आदेश के तहत भारत को केवल 10 प्रतिशत टैरिफ देना होगा, जो पूर्व निर्धारित 18 प्रतिशत से कम है. इस प्रकार अल्पकालिक रूप से देखा जाए तो भारत के लिए यह राहत जैसा कदम प्रतीत होता है.
व्हाइट हाउस की जारी फैक्ट शीट में कहा गया है कि जिन देशों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले ट्रंप प्रशासन के साथ टैरिफ समझौते किए थे, उन्हें अब केवल 10 प्रतिशत ड्यूटी का सामना करना पड़ेगा, भले ही वे पहले अधिक दर पर सहमत हुए हों. यह व्यवस्था अस्थायी है, लेकिन इससे अमेरिकी आयातकों और निर्यातक देशों दोनों को कुछ हद तक स्पष्टता मिलती है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” व्यापार नीति का विस्तार है. इसका उद्देश्य अमेरिकी उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाना और कथित अनुचित व्यापार प्रथाओं पर अंकुश लगाना है. हालांकि आलोचकों का तर्क है कि ऐसे टैरिफ वैश्विक व्यापार संतुलन को बाधित कर सकते हैं और उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त लागत का बोझ डाल सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया है की कार्यकारी शक्तियों की भी सीमाएं हैं, लेकिन प्रशासन द्वारा कानूनी विकल्पों का उपयोग यह दर्शाता है कि नीति-निर्माण में लचीलापन अभी भी मौजूद है.
इस बीच, भारत का एक प्रतिनिधिमंडल अगले कुछ दिनों में अमेरिका की यात्रा करने वाला है, जहां अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने पर चर्चा होगी. ऐसे समय में जब वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं और भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं, यह वार्ता दोनों देशों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है.अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने भले ही ट्रंप प्रशासन की मूल टैरिफ नीति को झटका दिया हो, लेकिन नए कार्यकारी आदेश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि व्यापार नीति को लेकर सख्त रुख बरकरार रहेगा. आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा की क्या यह 10 प्रतिशत का अस्थायी टैरिफ स्थायी ढांचे में बदलता है या फिर अमेरिका और उसके व्यापारिक साझेदारों के बीच नई संतुलित व्यवस्था उभरकर सामने आती है.
खुशी डैंग, प्रोड्यूसर