डेली24भारत डेस्क: भारत ने वर्ष 2030 तक देश से मलेरिया को पूरी तरह खत्म करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है, लेकिन इस दिशा में की जा रही कोशिशों के सामने अब एक गंभीर और नई चुनौती उभरकर सामने आई है। मलेरिया फैलाने वाले मच्छर न केवल अपना पारंपरिक व्यवहार बदल रहे हैं, बल्कि कई इलाकों में वे आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली कीटनाशक दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता भी विकसित कर चुके हैं।
इस चौंकाने वाले तथ्य का खुलासा भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के तहत काम कर रहे नेशनल मलेरिया इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च (एनएमआईआर), गोवा द्वारा की गई एक हालिया वैज्ञानिक स्टडी में हुआ है।
आठ राज्यों के 14 जिलों में हुआ व्यापक अध्ययन
यह अध्ययन देश के आठ अलग-अलग राज्यों के 14 जिलों में किया गया, जिसमें मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों को विशेष रूप से चुना गया। रिसर्च का नेतृत्व संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक अजीत कुमार मोहंती ने किया।
अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों की विभिन्न प्रजातियों, उनकी संख्या, इंसानों को काटने की आदत, घर के अंदर या बाहर रहने की प्रवृत्ति, आराम करने के स्थान और कीटनाशकों के प्रति उनकी प्रतिक्रिया जैसे कई महत्वपूर्ण पहलुओं का गहराई से विश्लेषण किया।
एनाफिलीज क्यूलिफेसीज की बदलती आदतें
स्टडी में पाया गया कि एनाफिलीज क्यूलिफेसीज, जिसे भारत में मलेरिया फैलाने वाला सबसे प्रमुख मच्छर माना जाता है, अध्ययन में शामिल सभी राज्यों में मौजूद था। हालांकि, इसकी गतिविधियों में बड़ा बदलाव देखा गया।
छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में यह मच्छर सबसे अधिक संख्या में घरों के अंदर पाया गया, जबकि उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में इसकी मौजूदगी मुख्य रूप से घरों के बाहर दर्ज की गई। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि यह मच्छर अब अपने पारंपरिक व्यवहार से हटकर अलग-अलग परिस्थितियों में खुद को ढाल रहा है, जिससे मलेरिया नियंत्रण की रणनीतियों को नई चुनौती मिल रही है।
पूर्वोत्तर राज्यों में भी दिखा व्यवहारिक बदलाव
पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में भी मच्छरों के व्यवहार में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिला। असम और त्रिपुरा में कुछ मच्छर प्रजातियां अब पहले की तुलना में अलग तरह से आराम करती और सक्रिय रहती पाई गईं।
कुछ क्षेत्रों में मच्छरों द्वारा इंसानों को काटने की दर में भी वृद्धि देखी गई, जिससे मलेरिया के फैलने का खतरा और अधिक बढ़ जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि मच्छरों का यह बदला हुआ व्यवहार उन्हें नियंत्रण उपायों से बचने में मदद कर रहा है।
कीटनाशकों के खिलाफ बढ़ता प्रतिरोध, सबसे बड़ी चिंता
इस अध्ययन की सबसे चिंताजनक खोज यह रही कि कई जिलों में मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों ने आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली कीटनाशक दवाओं और स्प्रे के खिलाफ प्रतिरोध विकसित कर लिया है। इसका अर्थ यह है कि जिन रसायनों के जरिए मच्छरों को नियंत्रित किया जा रहा है, वे अब पहले की तरह प्रभावी नहीं रह गए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कीटनाशकों के प्रति मच्छरों के बढ़ते प्रतिरोध को ध्यान में रखकर रणनीतियों में समय रहते बदलाव नहीं किया गया, तो 2030 तक मलेरिया उन्मूलन का लक्ष्य हासिल करना बेहद मुश्किल हो सकता है।
वैज्ञानिकों ने जोर दिया है कि अब मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रमों में नई तकनीकों, वैकल्पिक कीटनाशकों और व्यवहार-आधारित रणनीतियों को शामिल करना जरूरी हो गया है, ताकि बदलते मच्छर व्यवहार और दवा-प्रतिरोध से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके।
भावना सिंह, प्रोड्यूसर