डेली 24 भारत : भारत में अस्थमा एक गंभीर और लगातार बढ़ती हुई स्वास्थ्य समस्या बन गई है. आंकड़ों के अनुसार, भारत में करीब 3.5 करोड़ लोग इस समस्या से प्रभावित हैं, और इसमें बच्चे से लेकर बड़े तक शामिल हैं. वैश्विक स्तर पर भारत अस्थमा के 13% मामलों का हिस्सा है, और यहां मौत की दर भी ज्यादा है. यह बीमारी केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब बच्चों और युवाओं में भी तेजी से फैल रही है. अस्थमा में इंफ्लेमेशन के कारण फेफड़ों की सांस लेने की नली प्रभावित होती है. इसके कारण सांस लेना मुश्किल हो जाता है और कई बार रोज के सामान्य कामकाज में भी मुश्किल होने लगती है. यह समस्या कभी-कभी हल्की होती है, तो कभी अचानक गंभीर रूप ले लेती है, जिसे अस्थमा अटैक कहा जाता है. अस्थमा कोई नई बीमारी नहीं है, लेकिन इसे समझना और मैनेज करना बहुत जरूरी है. कई बार लोग इसे सामान्य सर्दी-खांसी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जो गलत है. अगर समय पर ध्यान दिया जाए तो अस्थमा को कंट्रोल में रखा जा सकता है और सामान्य जीवन जिया जा सकता है.
अस्थमा फेफड़ों की एक क्रॉनिक डिजीज है. इसमें फेफड़ों के एयरवेज में यानी सांल लेने की नलियों में सूजन आ जाती है. कुछ ट्रिगर्स की वजह से ये नलियां सिकुड़ जाती हैं, उनमें बलगम भर जाता है और सांस लेना कठिन हो जाता है. इससे व्यक्ति को सांस लेने में तकलीफ, खांसी या सीटी जैसी आवाज आने लगती है. अस्थमा के दौरान वायुमार्ग में बलगम की मात्रा भी बढ़ जाती है, जिससे सांस का प्रवाह और बाधित हो जाता है. व्यक्ति को घरघराहट, खांसी, सांस फूलना और सीने में जकड़न जैसी समस्याएं होती हैं.
अस्थमा होने के पीछे कई कारण होते हैं, जो व्यक्ति की जीवनशैली, पर्यावरण और आनुवांशिक कारकों से जुड़े हैं. प्रदूषण- भारत जैसे देशों में अस्थमा का सबसे बड़ा कारण हवा में मौजूद धूल, धुआं, पराली का धुआं और वाहनों से निकलने वाली गैसें हैं. लगातार प्रदूषित हवा में सांस लेने से फेफड़ों की संवेदनशीलता बढ़ जाती है. एलर्जी- घर की धूल, परागकण, पालतू जानवरों के बाल, फफूंदी और परफ्यूम जैसे तत्व भी अस्थमा को ट्रिगर करते हैं. आनुवांशिक कारण- यदि परिवार में किसी को अस्थमा है, तो बच्चों में इसके होने की संभावना अधिक होती है. जीवनशैली और खानपान- अत्यधिक जंक फूड, मोटापा, व्यायाम की कमी और सिगरेट या धूम्रपान के संपर्क में आना भी जोखिम बढ़ाते हैं. मौसमी बदलाव- ठंडी हवा या अचानक मौसम बदलने से अस्थमा के अटैक की संभावना बढ़ जाती है.
अस्थमा का इलाज पूरी तरह संभव नहीं है, लेकिन इसे नियंत्रित किया जा सकता है. प्रदूषण से बचाव- मास्क पहनें और प्रदूषित जगहों पर जाने से बचें. घर की सफाई रखें- धूल, फफूंदी और एलर्जन से दूरी बनाएं. संतुलित आहार लें- फलों, सब्जियों और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर आहार फेफड़ों को मजबूत बनाता है. धूम्रपान से बचें- सक्रिय या निष्क्रिय दोनों ही रूपों में धूम्रपान अस्थमा को बिगाड़ता है. इनहेलर का सही उपयोग- डॉक्टर द्वारा दिए गए इनहेलर और दवाओं का नियमित इस्तेमाल करें. व्यायाम और योग- हल्के व्यायाम, प्राणायाम और अनुलोम-विलोम जैसी सांस की क्रियाएं फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ाती हैं.
अस्थमा कोई मामूली बीमारी नहीं है, बल्कि यह जीवनभर साथ चलने वाली एक क्रॉनिक स्थिति है, जिसे समय पर पहचानना और संभालना जरूरी है. भारत जैसे देश में जहां वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है, वहां अस्थमा से बचने के लिए जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है. सही जीवनशैली, प्रदूषण से बचाव और डॉक्टर की सलाह से इलाज लेकर अस्थमा को नियंत्रित किया जा सकता है. स्वस्थ फेफड़े ही स्वस्थ जीवन की नींव हैं- इसलिए अपनी सांसों का ध्यान रखना हर किसी की प्राथमिकता होनी चाहिए.