Daily 24 भारत डेस्क: दिल्ली में एक ओर जिस तरीके से लगातार प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है दूसरी ओर सरकार की तरफ से इसे कम करने की तकनीकी कोशिश की जा रही है जिसमें सरकार का पहला परीक्षण फेल हो गया जिसको लेकर अब विपक्ष सरकार को जमकर घेर रहा है लेकिन इस बीच सवाल भी खड़े होते हैं कि आखिर अधूरी तैयारी के साथ कैसे कृत्रिम बारिश का सपना दिल्ली की सरकार देख रही थी क्योकि मौसम वैज्ञानिक पहले ही कृत्रिम बारिश को लेकर चेतावनी जारी कर चुके थे कि अभी क्लाउड सीडिंग का समय बिल्कुल सही नहीं है बावजूद इसे इंम्लीमेंट किया गया ऐसे में समझते हैं कि कृत्रिम बारिश क्या है और क्यों क्लाउड सीडिंग फेल हो गई.
सबसे पहले समझने वाली बात ये है कि इस प्रक्रिया में पहले संभावित वर्षा वाले बादलों की पहचान की जाती है. फिर विमान से सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड या कैल्शियम क्लोराइड जैसे रसायन बादलों के भीतर छोड़े जाते हैं, जिससे जलवाष्प छोटे-छोटे बूंदों में संघनित होकर वर्षा बन सके. नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंस, यूनिवर्सिटी ऑफ़ रीडिंग (यूके) के रिसर्च साइंटिस्ट डॉ. अक्षय देओरास बताते हैं कि क्लाउड सीडिंग एक ऐसी तकनीक है जिससे उन बादलों से बारिश कराई जाती है जिनमें पहले से पर्याप्त नमी मौजूद हो डॉक्टर अक्षय के मुताबिक यह साफ आसमान से बारिश नहीं करा सकती.
‘फिलहाल हालात सही नहीं’
डॉ. देओरास के मुताबिक, अभी दिल्ली-एनसीआर के ऊपर पर्याप्त नमी नहीं है. आसमान में बादल जरूर हैं, लेकिन ये बारिश कराने लायक नहीं हर बादल क्लाउड सीडिंग के लिए उपयुक्त नहीं होता. उन्होंने कहा कि सर्दियों में क्लाउड सीडिंग तभी की जानी चाहिए जब पश्चिमी विक्षोभ के साथ उचित वर्षा वाल बादल मौजूद हों, वरना यह प्रयोग बेनतीजा रह सकता है.
मौसम वैज्ञानिक पहले ही दे चुके थे चेतावनी
दिल्ली सरकार जहां कृत्रिम बारिश को प्रदूषण से राहत का उपाय मान रही है, वहीं मौसम वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में क्लाउड सीडिंग न तो वैज्ञानिक रूप से सही है, न ही असरदार साबित होगी
दो फ्लाइट, दो घंटे की ऑपरेशन विंडो
पहली उड़ान- IIT कानपुर से 12:13 PM पर टेकऑफ, 2:30 PM पर मेरठ में लैंड
कुल 3-4 किलों सीडिंग मिश्रण हवा में छोड़ा गया
दूसरी उड़ान – मेरठ एयरस्ट्रिप से 3:45 PM पर उड़ी और 4:45PM पर उतरी
4 किलो सीडिंग मटेरियल का उपयोग किया गया
रूट लगभग पहले ऑपरेशन जैसा ही थी
ना के बराबर हुई बारिश
रिपोर्ट के मुताबिक केवल 0.1 MM हल्की बूंदाबादी 4 बजे नोएडा में दर्ज की गई यानि बारिश के लिहाज से असर न के बराबर ही रहा।
कितना पैसा बर्बाद हुआ
क्लाउड सीडिंग के इस प्रोसेस में 3.20 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं और आगे भी ऐसे ही खर्च होने की संभावना है यही नहीं एक्सपर्ट भी ये बताते हैं कि ये पैसे की बर्बादी है क्लाउड सीडिंग के बाद भी प्रदुषण बढ़ेगा ये पैसा बेकार गया है और आगे भी ऐसे ही फालतू खर्च की संभावना है क्लाउड सीडिंग के एक ट्रायल में 64 लाख रुपए खर्च होते हैं
कृत्रिम बारिश से जान माल का हो सकता है खतरा
प्रोफेसर शहजाद गनी ने कहा कि अगर पश्चिमी विक्षोभ के कारण बारिश होती है, तो क्लाउड सीडिंग करने का कोई मतलब नहीं है। और अगर क्लाउड सीडिंग प्रक्रिया के दौरान एक साथ तेज बारिश हो जाए, जिससे बहुत भारी बारिश हो और जान-माल का नुकसान हो तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? उन्होंने आगे कहा कि हम स्मॉग टावर, स्मॉग गन और क्लाउड सीडिंग जैसी सिल्वर बुलेट तकनीकें क्यों अपनाते हैं? विभिन्न स्रोतों से उत्सर्जन को व्यवस्थित रूप से कम करने की जरूरत है
क्या होती है क्लाउड सीडिंग?
क्लाउड सीडिंग यानी बादलों से कृत्रिम बारिश कराने की वैज्ञानिक प्रक्रिया है. इसमें मौसम वैज्ञानिक ऐसे बादलों की पहचान करते हैं जिनमें पर्याप्त नमी तो होती है, लेकिन वे खुद से बरस नहीं पाते और इन बादलों तक सेसना जैसे छोटे विमान या ड्रोन भेजे जाते हैं. विमान बादलों की ऊंचाई पर पहुंचकर सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड या पोटैशियम आयोडाइड जैसे रसायन फ्लेयर के रूप में छोड़ता है फिर ये रसायन बादलों के भीतर मौजूद जलवाष्प को आकर्षित कर उसे छोटे-छोटे जलकणों में बदल देते हैं. जब ये जलकण भारी हो जाते हैं, तो वे वर्षा के रूप में धरती पर गिरने लगते हैं और इसी प्रोसेस को क्लाउड सीडिंग कहते हैं