Daily 24 भारत डेस्क: दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण से राहत दिलाने के लिए क्लाउड सीडिंग यानी कृत्रिम बारिश की प्रक्रिया शुरू की गई है। इसके लिए सेसना प्लेन के जरिए आज ट्रायल किया गया। उम्मीद है कि अगले 15 मिनट से 4 घंटे के भीतर कहीं भी बारिश हो सकती है। फिलहाल उत्तरी करोल बाग, खेकड़ा, मयूर विहार और सादिकपुर में क्लाउड सीडिंग की गई है। यह प्रक्रिया आने वाले कुछ दिनों तक जारी रहेगी। दरअसल, पहले यह ट्रायल बुधवार को होना था, लेकिन बादलों की अनुकूल स्थिति देखते हुए इसे आज ही कर दिया गया। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस कृत्रिम बारिश का पानी हमारी सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है? इस पर भारतीय मौसम विभाग के पूर्व डीजीएम के. जे. रमेश ने सरल शब्दों में सभी सवालों के जवाब दिए हैं।
कृत्रिम बारिश क्या होती है?
आमतौर पर बारिश तब होती है जब बादलों में नमी बढ़कर पानी की बूंदों में बदल जाती है और फिर जमीन पर गिरती है। लेकिन कृत्रिम बारिश में ऐसा स्वाभाविक रूप से नहीं होता। इसमें पहले से मौजूद बादलों को तकनीकी तरीके से बड़ा और भारी बनाया जाता है। जब बादलों में नमी तो होती है, लेकिन बारिश नहीं होती, तब वैज्ञानिक रासायनिक पदार्थों की मदद से बादलों में ऐसी प्रक्रिया करते हैं जिससे नमी बर्फ के कणों या पानी की बूंदों में बदल जाए। फिर वही बूंदें नीचे गिरकर बारिश का रूप ले लेती हैं। यही प्रक्रिया कृत्रिम बारिश कहलाती है।
क्लाउड सीडिंग क्यों और कैसे की जाती है? पूरा प्रोसेस क्या है?
बादल नमी से बनते हैं, लेकिन बारिश के लिए उनमें क्लाउड कंडेंसेशन न्यूक्लियाई की प्रक्रिया जरूरी होती है, जिससे पानी की बूंदें बनती हैं। कई बार ऐसा होता है कि बादलों में नमी तो होती है, लेकिन वे इतने बड़े नहीं होते कि बारिश कर सकें। ऐसी स्थिति में क्लाउड सीडिंग की मदद से बादलों को बड़ा किया जाता है ताकि वे बरस सकें।
इस प्रक्रिया में सबसे पहले रडार या सैटेलाइट के जरिए यह देखा जाता है कि आसमान में बादल कहां हैं, उनका आकार कितना है और वे किस दिशा में जा रहे हैं। जब यह सब तय हो जाता है, तो अगर किसी जगह (जैसे दिल्ली) पर बारिश करानी हो, तो वहां पहुंचने से पहले ही बादलों में सिल्वर आयोडाइड जैसे रासायनिक तत्व इंजेक्ट किए जाते हैं। ये तत्व बादलों के अंदर बूंदें बनने की प्रक्रिया को तेज करते हैं, जिससे बादल भारी होकर बारिश के रूप में बरस जाते हैं।
क्या बादलों तक पानी पहुंचाया जाता है?
नहीं, कृत्रिम बारिश में बादलों तक पानी नहीं पहुंचाया जाता। बादलों में पहले से ही पर्याप्त नमी होती है, उसी का इस्तेमाल किया जाता है।
क्या बिना बादलों के क्लाउड सीडिंग हो सकती है?
नहीं, ऐसा संभव नहीं है। क्लाउड सीडिंग तभी की जा सकती है जब आसमान में बादल मौजूद हों। अभी ऐसी कोई तकनीक नहीं है जो बादल बना सके या नकली बादल तैयार कर सके।
क्या एक बार में पूरी दिल्ली में बारिश कराई जा सकती है?
नहीं, क्योंकि यह प्रक्रिया बादलों पर निर्भर करती है। जिस दिशा में हवा के साथ बादल जा रहे होते हैं, केवल उसी दिशा में क्लाउड सीडिंग की जा सकती है। इसके लिए टारगेटेड इलाके चुने जाते हैं।
क्या बादलों को अपनी मर्ज़ी से इधर-उधर किया जा सकता है?
नहीं, बादलों की दिशा या गति को बदला नहीं जा सकता। यह पूरी तरह हवा की दिशा पर निर्भर करता है। सिर्फ वही बादल, जो दिल्ली की ओर बढ़ रहे हों, उन्हीं से कृत्रिम बारिश कराई जा सकती है।
क्या कृत्रिम बारिश का पानी सेहत के लिए हानिकारक है?
नहीं, यह पानी बिल्कुल सुरक्षित है। कई शोधों में पाया गया है कि इसमें मौजूद सिल्वर आयोडाइड की मात्रा बहुत कम होती है और इसका स्वास्थ्य पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता। इसलिए घबराने की जरूरत नहीं है।
अब तक कृत्रिम बारिश कितनी सफल रही है?
अब तक महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु जैसे राज्यों में कृत्रिम बारिश की कोशिशें की गई हैं और उनके नतीजे अच्छे रहे हैं। अध्ययन बताते हैं कि इससे बारिश की मात्रा में 15 से 20 फीसदी तक बढ़ोतरी हो सकती है।
इसमें कितना खर्च आता है?
खर्च इस बात पर निर्भर करता है कि इसमें कितने विमान और टीमें लगी हैं और कितने बड़े क्षेत्र में बारिश करानी है।
क्या इससे आगे के इलाकों को नुकसान होता है?
हां, अगर बढ़ते हुए बादलों को किसी खास जगह पर बरसा दिया जाए तो आगे के इलाकों में बारिश थोड़ी कम हो सकती है। हालांकि यह असर बहुत बड़ा नहीं होता और बारिश वहीं कराई जाती है जहां उसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
क्या कृत्रिम बारिश से प्रदूषण कम होगा?
हां, बारिश से हवा में मौजूद प्रदूषक तत्व नीचे गिर जाते हैं, जिससे हवा साफ होती है। हालांकि अगर यह सिर्फ कुछ जगहों पर की गई, तो उन्हीं इलाकों में असर दिखेगा, बाकी जगहों पर स्थिति पहले जैसी ही रहेगी।