डेली24 भारत डेस्क: भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि की दिशा में कदम बढ़ाते हुए अपने स्वदेशी स्थायी अंतरिक्ष स्टेशन (Bharatiya Antariksh Station – BAS) के निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना की आधारशिला रखी है और इसे पूरा करने के लिए ठोस योजना बनाई है. इस परियोजना का पहला मॉड्यूल BAS-01 वर्ष 2028 तक अंतरिक्ष में भेजा जाएगा, जबकि 2035 तक यह पूरी तरह से कार्यरत अंतरिक्ष स्टेशन के रूप में विकसित हो जाएगा. यह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक नया और महत्वपूर्ण अध्याय साबित होगा.
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का उद्देश्य केवल अंतरिक्ष में पहुंचने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वहां मानव उपस्थिति को लंबे समय तक बनाए रखने और वैज्ञानिक प्रयोगों को अंजाम देने के लिए बनाया जा रहा है. यह स्टेशन अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के समान विकसित किया जाएगा, लेकिन पूरी तरह स्वदेशी तकनीक और संसाधनों के बल पर. ISRO के अधिकारियों ने बताया कि यह परियोजना गगनयान मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम के बाद भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का अगला बड़ा कदम है. गगनयान मिशन के जरिए भारत अपने अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की कक्षा तक भेजने की तैयारी कर रहा है, जबकि BAS का लक्ष्य अंतरिक्ष में लंबे समय तक रहने और वहां वैज्ञानिक तथा तकनीकी शोध करने की सुविधा प्रदान करना है.
BAS-01 मॉड्यूल अत्याधुनिक तकनीक से निर्मित होगा। प्रत्येक मॉड्यूल का व्यास लगभग 3.8 मीटर और ऊँचाई करीब 8 मीटर होगी. इन्हें हाई-पावर्ड एल्यूमिनियम एलॉय (AA-2219) से तैयार किया जाएगा, जो मानव मिशनों के लिए मान्यता प्राप्त सामग्री है. ISRO ने स्पष्ट किया है कि मॉड्यूल को गगनयान मिशन के सुरक्षा और गुणवत्ता मानकों के अनुरूप विकसित किया जाएगा, क्योंकि अंतरिक्ष यात्री इन्हीं मॉड्यूल्स के भीतर रहकर काम करेंगे. इसके लिए दो पूर्ण सेट मॉड्यूल धरती पर तैयार किए जाएंगे ताकि परीक्षण और गुणवत्ता मूल्यांकन के बाद सर्वोत्तम हार्डवेयर अंतरिक्ष में भेजा जा सके.
इस परियोजना की विशेषता यह है कि यह पूरी तरह भारतीय प्रयास होगी. सरकार किसी उत्पादन सुविधा के लिए वित्तीय सहायता नहीं देगी और किसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया को आउटसोर्स करने की अनुमति नहीं होगी. ISRO कंपनियों को कच्चा माल, तकनीकी ड्रॉइंग और थ्री-डी मॉडल उपलब्ध कराएगा, लेकिन उच्च गुणवत्ता वाले हार्डवेयर का निर्माण और समय पर उपलब्ध कराना पूरी जिम्मेदारी कंपनियों की होगी. इसके निर्माण में अत्याधुनिक वेल्डिंग तकनीक, प्रेशर टेस्ट, लीक टेस्ट और नॉन-डिस्ट्रक्टिव टेस्टिंग जैसी कठोर प्रक्रियाओं का पालन किया जाएगा.
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन देश के वैज्ञानिक और तकनीकी भविष्य में अहम भूमिका निभाएगा. यहां माइक्रोग्रैविटी में दीर्घकालिक प्रयोग किए जा सकेंगे, जैसे मानव शरीर पर अंतरिक्ष वातावरण का प्रभाव और नई तकनीकों का परीक्षण. ये प्रयोग भविष्य के गहरे अंतरिक्ष अभियानों के लिए भी महत्वपूर्ण होंगे. अगर निर्धारित समयसीमा के अनुसार कार्य संपन्न होता है, तो 2028 तक भारत का पहला स्पेस स्टेशन मॉड्यूल पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित हो सकता है.
यह उपलब्धि भारत को उन चुनिंदा देशों में शामिल कर देगी, जिन्होंने न केवल अंतरिक्ष में मानव भेजा है, बल्कि वहां स्थायी मानव उपस्थिति स्थापित करने की क्षमता भी हासिल की है. यह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के इतिहास में एक नई उपलब्धि होगी और आने वाले दशकों में देश की वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताओं को नई ऊँचाइयों तक ले जाने में सहायक बनेगी.
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन परियोजना केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह देश की वैज्ञानिक महत्वाकांक्षा, स्वदेशी विकास और वैश्विक अंतरिक्ष मंच पर भारत की स्थिति को मजबूत करने का प्रतीक है. यह कदम भारत को अंतरिक्ष अनुसंधान में नए मुकाम पर पहुंचाएगा और भविष्य की अंतरिक्ष यात्राओं के लिए ठोस आधार प्रदान करेगा.
भारत अब न केवल अंतरिक्ष में प्रवेश करने वाला राष्ट्र है, बल्कि वहां लंबी अवधि तक मानव उपस्थिति बनाए रखने और वैज्ञानिक खोजों में योगदान देने वाला देश बनने की ओर बढ़ रहा है. यह सफलता देशवासियों के लिए गर्व का क्षण है और विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भारत की संभावनाओं को और भी उज्जवल बनाएगी.
खुशी डैंग, प्रोड्यूसर