डेली24 भारत डेस्क: तेज रफ्तार के इस दौर में, जहां दुनिया बुलेट ट्रेन, मैग्लेव और हाइपरलूप जैसी तकनीकों की होड़ में लगी है, वहीं हिंदुस्तान के दक्षिणी छोर पर एक ट्रेन है जो मानो समय को थाम लेती है. यह ट्रेन न दौड़ती है, न भागती है, बल्कि प्रकृति की गोद में शांति से सरकती हुई चलती है. उसका सफर मंज़िल तक पहुंचने से ज्यादा उस सफर को महसूस करने के लिए होता है. यह है मेट्टूपालयम से ऊधगमंडलम (ऊंटी) तक चलने वाली नीलगिरि पैसेंजर ट्रेन, जिसे दुनिया “सबसे खूबसूरत और सबसे धीमी ट्रेनों” में से एक मानती है.
हैरानी की बात यह है कि 46 किलोमीटर की दूरी तय करने में इस ट्रेन को पूरे 5 घंटे लगते हैं. हाँ, आपने सही पढ़ा- 5 घंटे! यानी आप साइकिल से भी इससे जल्दी ऊंटी पहुंच सकते हैं. लेकिन इस ट्रेन की खूबसूरती ही इसकी यही धीमी चाल है. धीमी रफ्तार में पहाड़ों को चीरती हुई चलती यह ट्रेन, यात्री को एक-एक लम्हा महसूस कराती है, जंगलों की महक, वादियों का सन्नाटा, चाय के बागानों की हरियाली, और हर मोड़ पर खुलती नई दुनिया.
इस दौरान ये ट्रेन 208 तेज और खतरनाक मोड़ों, 250 छोटे-बड़े पुलों, 16 अंधेरी टनलों से गुजरती हुई एक ऐसे अनुभव में डूबो देती है, जिसे लोग सालों तक याद रखते हैं. ट्रेन की खास पहचान उसकी गहरे नीले रंग की क्लासिक बोगियां हैं, जिन्हें देखकर लगता है मानो कोई पुरानी फिल्म का दृश्य चल रहा हो. जब ट्रेन पहाड़ की ढलानों पर धीरे-धीरे चढ़ती है, तो उसकी खिड़कियों से दिखते दृश्य हर पल बदलते रहते हैं.
रूट में आने वाले प्रमुख स्टेशन!
- किल्लार
- कुनूर
- वेलिंगटन
- लवडेल
- और अंत में-ऊधगमंडलम (ऊंटी)
यह वह सफर है जहां गंतव्य से ज्यादा रास्ता मायने रखता है. नीलगिरि पैसेंजर ट्रेन की खूबसूरती यह भी है कि यह बेहद किफायती है.
- First श्रेणी – लगभग ₹600
- Second श्रेणी – इसका लगभग आधा
कम पैसों में इतना अनमोल अनुभव शायद ही दुनिया में कही और मिलता हो.
ट्रेन का समय!
- मेट्टूपालयम से प्रस्थान: सुबह 7:10
- ऊटी पहुंचना: दोपहर लगभग 12:00
- ऊटी से वापसी: दोपहर 2:00
- मेट्टूपालयम पहुंचना: शाम 5:35
यह समय-सारणी पर्यटकों को एक पूरा दिन ऊटी घुमने का मौका देती है, यही वजह है कि टिकट मिलना काफी कठिन होता है.
कब हुआ था इसका निर्माण!
भारत में हिल स्टेशनों को यातायात से जोड़ने के लिए अंग्रेजों ने काफी मेहनत की. रिपोर्ट के मुताबिक 1854 में पहली बार प्रस्तावित नीलगिरि माउंटेन रेलवे को साकार होने में लगभग पांच दशक लगे. पहाड़ों की ऊंचाई और तीखी चढ़ाई ने इस प्रोजेक्ट को कई चुनौतियां दी. आखिरकार 1891 में इसका काम शुरू हुआ 1908 तक यह मीटर गेज की एकल ट्रैक लाइन तैयार हो गई. दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे और कालका-शिमला रेलवे के साथ यह लाइन यूनेस्को की ‘माउंटेन रेलवेज ऑफ इंडिया’ विरासत सूची में शामिल है.
तेज गति वाली ट्रेनों में आपको खिड़की से बाहर झांकने का भी समय नहीं मिलता, सब कुछ भागता नज़र आता है. लेकिन नीलगिरि ट्रेन आपको वह संसार दिखाती है जो भागते हुए देखना असंभव है.
- उसकी धीमी-सी चाल में है:
- पहाड़ों का सौंदर्य
- वादियों का संगीत
- जंगलों की खुशबू
- और बचपन जैसी मासूमियत
यही वजह है कि हर साल हजारों और विदेशियों तक इस ट्रेन का अनुभव करने आते हैं. नीलगिरि पैसेंजर ट्रेन सिर्फ एक यात्रा नहीं, यह भारत की आत्मा, प्रकृति, इतिहास और विरासत का संगम है. जब ट्रेन उधगमंडलम की ओर चढ़ती है, तो लगता है जैसे समय धीरे-धीरे पीछे लौट रहा है और प्रकृति आपको अपने असली रूप से रूबरू करा रही है और शायद यही वजह है कि तेज रफ्तार के इस युग में भी यह धीमी ट्रेन लोगों के दिलों में तेजी से जगह बना लेती है.
खुशी डैंग, प्रोड्यूसर