डेली24 भारत डेस्क: नेशनल एग्जामिनेशन बोर्ड ऑफ मेडिकल साइंसेज (NBEMS) और स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा NEET-PG 2025 के न्यूनतम क्वालिफाइंग कट-ऑफ में किए गए हालिया बदलाव ने देशभर में बहस को जन्म दिया है. SC, ST और OBC श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम कट-ऑफ को 40वें परसेंटाइल से घटाकर सीधे -40 कर दिया गया है। इस फैसले के बाद सोशल मीडिया और शैक्षणिक विशेषज्ञों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या इतने कम स्कोर वाले उम्मीदवार भी डॉक्टर बन पाएंगे और मरीजों की सुरक्षा पर क्या असर होगा.
NBEMS ने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के निर्देश के तहत NEET-PG 2025 की क्वालिफाइंग कट-ऑफ को आधिकारिक तौर पर रिवाइज कर दिया है. यह रिवाइज्ड कट-ऑफ 2025-26 अकादमिक सेशन के तीसरे राउंड की काउंसलिंग में शामिल उम्मीदवारों पर लागू होगी. SC, ST और OBC कैटेगरी के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल को 40वें से घटाकर जीरो कर दिया गया है. यानी, 800 में से -40 अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवार भी मेडिकल पोस्टग्रेजुएशन में काउंसलिंग में हिस्सा ले सकते हैं.
जनरल और EWS कैटेगरी के उम्मीदवारों के लिए भी न्यूनतम परसेंटाइल घटाई गई है. जनरल और EWS उम्मीदवारों के लिए 50वें से घटाकर 7वें परसेंटाइल किया गया है, जिससे कट-ऑफ स्कोर 276 से घटकर 103 हो गया है. वहीं, जनरल PwD उम्मीदवारों के लिए 45वें से घटाकर 5वें परसेंटाइल किया गया है, जिससे स्कोर 255 से घटकर 90 रह गया है. NBEMS ने यह स्पष्ट किया है कि केवल क्वालिफाइंग क्राइटेरिया बदले हैं, जबकि उम्मीदवारों की रैंक में कोई बदलाव नहीं हुआ है.
इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई है. कई यूजर्स ने सवाल उठाया है कि क्या इतने कम अंकों वाले उम्मीदवार मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित कर पाएंगे. एक यूजर ने लिखा, “NEET-PG 2025 का कट-ऑफ ST/SC/OBC के लिए -40 मार्क्स है. क्या आप ऐसे डॉक्टरों को अपने माता-पिता या परिवार का इलाज करने देंगे?” वहीं, दूसरे ने कहा कि यह फैसला मेहनती उम्मीदवारों के लिए निराशाजनक है और शैक्षणिक मानकों में गंभीर गिरावट को दर्शाता है. स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस कदम को खाली पोस्टग्रेजुएट सीटों को भरने और उम्मीदवारों को मेडिकल शिक्षा का अवसर देने के उद्देश्य से मंजूरी दी है. NBEMS ने अपने आधिकारिक नोटिस में कहा कि पात्रता अस्थायी है और एडमिशन के समय MBBS/FMGE कुल अंक, फेस आईडी और बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन के माध्यम से उम्मीदवार की योग्यता की जांच की जाएगी.
विशेषज्ञों का मानना है कि कट-ऑफ को इतना कम करना शिक्षा और स्वास्थ्य प्रणाली के लिए चिंता का विषय है. हालांकि, सरकार का तर्क है कि रैंक के आधार पर मेरिट सूची पहले जैसी रहेगी और केवल न्यूनतम पात्रता को आसान बनाया गया है, ताकि खाली पोस्टग्रेजुएट सीटें न रहें. इस नीति का उद्देश्य अधिक उम्मीदवारों को अवसर देना है, लेकिन इससे डॉक्टर बनने वाले उम्मीदवारों की क्षमता और भविष्य में मरीजों की सुरक्षा पर सवाल उठ सकते हैं. नीट पीजी की यह नई नीति खासकर आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के लिए राहत भरी हो सकती है, क्योंकि अब वे कम अंक लेकर भी पोस्टग्रेजुएट काउंसलिंग में भाग ले सकते हैं. वहीं, आलोचक इसे शिक्षा प्रणाली और चिकित्सा पेशे में गुणवत्ता के लिए खतरे के रूप में देख रहे हैं. इस फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि सरकार खाली सीटें भरने और उम्मीदवारों को अवसर देने को प्राथमिकता दे रही है, भले ही इसके लिए न्यूनतम क्वालिफाइंग क्राइटेरिया को असामान्य रूप से कम करना पड़ा.
इस बदलाव ने NEET-PG प्रक्रिया और मेडिकल शिक्षा प्रणाली में एक नई बहस को जन्म दिया है. सवाल यह उठता है कि क्या कम स्कोर वाले उम्मीदवार वास्तव में मरीजों के स्वास्थ्य और सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हैं. समय बताएगा कि इस नीति का लंबी अवधि में चिकित्सा पेशे और गुणवत्ता पर क्या असर पड़ेगा.
खुशी डैंग, प्रोड्यूसर